कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०६ ) बीजक कबीरदास ।
बन हैं ते लाय देइ हैं अर्थात् गुरुवनकी बाणी सुनि सुनिकै शिष्यलोग जब
और और जीवनको उपदेश कियो तब उनको सबको साहबको विवेकजरिजरि-
गयो औरैऔर में लगिगये विवेक करिकै साहबको ज्ञानजो हैबेको रहै सो न
भयो तब संसार समुद्रमें मच्छ जोहै काल सो अहेर खेलै है अर्थात् जीवनको
खाइ है ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि बूझै ।
बिनु पंखे उड़ि जाहि अकाशै जीवहि मरण न सूझै ॥ ५॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, यह संसार अद्भुतहै औ ब्रह्म अद्भुत है इन दूनोंको
ज्ञान जिनको है कि, ये धोखा है ऐसो को है ? अर्थात् कोई नहींहै परन्तु जों-
कोई बिरला बूझनवारो होइ औ मन माया है दोनों धोखा हैं येई तहँ उड़ै
हैं नाना पदार्थनको स्मरण होइहै नाना योनि पावैहै संसारमें तिनको छोड़ि
एक परमपुरुष श्रीरामचन्द्रही को ह्वैरहै तौ ब्रह्म जो है आकाश ताते उड़ि
कहैं निकसिकै साहबके यहां पहुंचै जाइ जो कहो बिना पखना कैसे उड़ि-
जाय । सो यहां उपासना दुइप्रकारकी हैं एक बांदर कैसो बच्चा भजन करैहै
कि, बांदरको बच्चा अपनी माताको आपही धरे रहै है सो यहजीव नाना प्रका
रकै शास्त्रादिकनते विचार करिकै औ असांच मत खंडन करिकै आपही अपने
साहबको धरे रहै है भ्रम में नहीं परै है । औ दूसरी उपासना बिलारीके
बच्चाकीसीहै बिलारीको बच्चा और सबकी आशा तोरे माताकी आशा किये रहैहै
सों वह बिलारी अपने बच्चाको जहां सुपास देखै है तहां आपही उठाइ लैजाइहै।
तैसें यह जीव वेद शास्त्रको छोड़िकै न काहूके मतके खंडन करिबेकी सामर्थ्य है
न अपने मतके मंडन करिबेकी सामर्थ्यहै साहबको जानै है कि, मैं साहब का
हौं दूसरो मत सुनतही नहीं है सो जब सब पक्ष को छोड़िकै साहब कों
ह्वैरह्यो, तब याको साहबही हंसस्वरूप ह्वैकै अपने लोकको उठाइ लैजाइहै ॥५॥
इति बावनवां शब्द समाप्त ।