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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 766 में से

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पृष्ठ 350

( ३०० ) बीजक कबीरदास ।
ओस न प्यास मंदिर नहीं जहँवां। सह स्रो धेनु दुहावै तहँवां ३
नितै अमावस नित संक्रांति। नित नित नवग्रह बैठे पांति ४
मैं तोहिं पूँछौं पण्डित जना। हृदया ग्रहण लागु केहि खना ५
कह कबीर यतनौ नहीं जान। कौन शब्द गुरु लागा कान६
अब योगिनको कहैं ।
बुझ बुझ पंडित पद निरवाना। सांझ परे कहँवां बस भाना १
नीच ऊँच पर्वत ठेला न भीत। बिन गायन तहँवां उठ गीत२
हे पंडित ! तुम वह निर्वाणपदको बूझोतो जो त्रिकुटीमें ध्यान लगाइकै भानु
कहे सूर्य देखोहौं । सो सूर्य सांझपरे कहे जब शरीर छूटिगयो तबकहां बसैहै?
॥ १ ॥ नीचते ऊंचेको कहे कुंडलिनीते गैबगुफामें जब आत्मा जाइहै तौनै
पर्बतमें न ठेलाहै न भीतिहै। औ बिना गायन तहंवां गीत उठैहै कहे अनहदकी
ध्वनि सुनिपरै है ॥ २ ॥
ओस न प्यास मंदिर नहीं जहँवां। सहस्रो धेनु दुहावै तहँवां ३
ओस जो वहां परे है कहे अमृत जो वहां झरे है ताको पान करिकैन प्यास
है जाइहै कहे पियास नहीं लगैहै । अर्थात् ओसन पियास नहीं जाइहै जो मानि-
राखेहैं कि, अमृत पीकै हम अमर ह्वैजाइँगे सो अमर न होउगे । औ जो गैब
गुफा पर्वतमें घरमानि राखैहैं सो वहाँतेरो मंदिर कहै घर नहीं है अर्थात् वहां
तो शून्यहै तहां सहस्र दलमें धेनु दुहावै है कहे धेनु जोहै गायत्री ताको अर्थ
जोहै वहदूध ज्ञान स्वरूप ब्रह्म ताको बिचार करैहै आपने को ब्रह्म मानै हैं जब
शरीर सरिजाइ तब गैबगुफा जरिजाइहै औ फिरि शरीर धारणकरै है ॥ ३ ॥
नितै अमावस नित संक्रांति। नित नित नव ग्रह बैठे पांति ४॥
औ तहां नित अमावस रहैहै चन्द्रमा सूर्यनके ओट ह्वैजाइ सो अमावस कहा-
वै है । सो यहांते आत्मा जाइकै ब्रह्मज्योतिमें लीन ह्वैजाइहै ताते नित
अमावस रहै है औ फिरि जब समाधि उतरी तब शंकामें परिगयो वही वाकों