कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २९४ ) बीजक कबीरदास ।
जिनको जिनको यापदमें वर्णन करिआये तेते सब महाप्रलयमें लीन होइहैं ।
एक कहे सम अधिकते रहित जो साहव नहीं मुवा । औ सिरजनहार जों
समष्टि जीव सो नहीं मुवाहै अर्थात् सो रहिजायहै । और कौन नहीं मुवा
तिनको कबीरजी बतावैं हैं । जीवतो मरै नहीं है शरीरहीमरैहै सो जे जे देवतं-
नको मुवा कहिआये ते जौन रूपते साहबके समीप रहै हैं सो स्वरूपइनको नहीं
मुवै है पार्षद शरीरते बनै रहै ह यहां अपने अंशन्ते जगत् कार्यकरै है सो
पूर्व लिखिआये हैं ॥ ५ ॥
इति पैंतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छियालीसवां शब्द ॥ ४६ ॥
पंडित अचरज यक बड़ होई ।
यक मर मुये अन्न नहिं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ १ ॥
करिकै स्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ ।
हांडी हाड़ हाड थारी मुख अव षट कर्म बनेऊ ॥ २ ॥
धरम कथै जहँ जीव बधै तहँ अकरम करे मेरे भाई ।
जो तोहरे को ब्राह्मण कहिये तौ केहि कहिये कसाई ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४ ॥
अब जे षट्कर्मी पंडित लोग बलिदान करिकै मांस खाइ हैं तिनको कहै हैं ॥
पंडित अचरज यक बड़ होई ।
यक मर मुये अन्न नहिं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ १ ॥
करिकै स्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ ।
हांड़ी हाड़ हाड़ थारी मुख अव षट कर्म बनेऊ ॥ २ ॥
हे पंडित ! एक बड़ो आश्चर्य होइ है । एक मरै है ताके मरेते कोई
अन्न नहीं खायहै अरु वाके छुयेते अशुद्ध ह्वै जाइहै, अरु एक जीवको मारि