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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

Here is the accurate transcription of the page into Devanagari text, with line-by-line markers preserved:

( २७२ ) बीजक कबीरदास ।
शरीरमें शिकारखेलैहै । पारथ कहे शिकारी जो तैं सो बोटालइहै अर्थात् नाना
उपासना नानाज्ञान करत फिरै है पै मन तोको नहीं छोड़ै है । साउज ते नहीं
बचैहै। वाणी रूप जो है पानी नानाशास्त्र तौनेमें( भूभुरि जोसूर्य्यनके तापते तपेत
भूमि होयहै सोभूभुरि कहावै है; ऐसे संसार तापते तपितजो)तेरा अंतःकरण सो
तलफिगयो अर्थात् अधिकअधिक शङ्का होतभई तिनते अधिकतप्त भयो शीतल न
भयो काहेते कि, धूरि जो सूखा ब्रह्मज्ञान सो हिलोरा देनलग्यो कहेशारूत्रनमें वही
धोखा ब्रह्मही देखपरन लग्यो । शास्त्रनको तात्पर्य्य साहब तिनको न जान्यो॥२॥
धरती बर्षै बादल भीजै भीट भया पैराऊ ।
हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ ३ ॥
बुद्धिजोहै सो धरती है काहेते सब मतनको आधारयहीहै बाणीरूप पानी
बरसै है कहे नानामटनको निश्चय कैकै प्रकट करै है । अरु यह बाणी
जीवनही ते प्रथम निकसी है सो जीव बादल है सो भीजै कहे वोई मतनको
ग्रहणकियो । यह लोकोक्तिहै किं, फलाने फलानेमें भीजिरहे हैं कहे आसक्त
द्वैरहे हैं। भीट चारो वेदहैं मर्यादाते पैराउह्वैगये कहे उनकी थाह कोई न
पावतभयो अर्थात् तात्पर्य्य कारिकै जोपरमपुरुष श्रीरामचन्द्रको वर्णनकरेहै सोकोई
न पावतभयो । ताल सूखे हंस उड़ैहै यहां हंसउड़े तालसूखे हैं जब हंस उड़ो कहैं
यहजीव निकसिगयो तबताल जोशरीरहै सोसूखि गयो । तब बासना जेहैं तेई
चहला हैं तिनमें पाँउ बँधिरह्यो । जैसे तलाउ जबसूखेउ औ पुनिचौमासेमें
जब जल बरसयो तब जस को तस द्वैगयो, तैसे बासनामें पाँउफँसिरह्योहै दूसर
शरीर जब पायो तब फिर वही शरीरमें तलाउमें हंसजीव बूडन उतरान
लग्यो है । सो भाव यह कि, उड़नको तो करै है पर शरीर तालते अंतै नहीं
जाइ सकैहै कोई योनियैमें रहै है ॥ ३ ॥
जौलखि करडोलै पगचलई तौलखि आश न कीजै ।
कह कबीर जेहि चलत न दीखै तासु वचन का लीजै॥४॥
जबलग पाँउ चलैहै करडोलै है कहे शरीर बनोहै तबलगि गुरुवालोगनकी
आश न करिये जो आश करोगे तो याहीभांति बँधि रहैगो । सो कबीरजी कहैं

हैं जे गुरुवा लोग नाना पदार्थनमें आश लगाइ देइहैं तिनहींते नहीं चलत
बनै है तौ तिनको कह्यो वचन कैसे कीजिये कहे कैसे मानिये ? अर्थात् उनके
यहां न जाइये काहेते कि, वे साहबको भुलाइकै और में लगाइ देंगे । संसार
ही में फँसो रहैगो यामें धुनि यहहै कि, जे संसारते छूटेहैं रामोपासकहैं तिनहीं
को बचन मानिये तिनहीं के यहां जाइये ॥ ४ ॥
इति इकतीसवां शब्द समाप्त ।

अथ बत्तीसवां शब्द ॥ ३२ ॥
हंसाहो ! चित चेतु सबेरा।इन्ह परपंच करल बहुतेरा ॥१॥
पाखंड रूप रच्यो इन्ह तिरगुण यहि पाखंड भूल संसारा ।
घरको खसम बधिक भो राजा परजा काधौं करै बिचारा॥२॥
भक्ति न जानै भक्त कहावै तजि अमृत विष कैलिय सारा।
आगे बड़े ऐसही भूले तिनहुं न मानल कहा हमारा ॥३॥
कहल हमार गांठी बांधो निशि वासर हि होहु हुशियारा ।
ये कलिके गुरु बड़ परपंची डारि ठगौरी सब जग मारा॥४॥
वेद किताव दोय फंद पसारा ते फंदे पर आप बिचारा ।
कह कबीर ते हंस न बिछुड़े जेहिमैं मिल्यो छोड़ावनहारा ५
हंसाहो चितचेतु सवेरा । इन्ह परपंच करल बहुतेरा ॥१॥
पाखंडरूप रच्यो इन्ह तिरगुण तेहि पाखंड भूल संसारा ।
घरको खसम बधिक भो राजा परजा काधौं करै बिचारा २
हे हंसा जीवौ ! सबेरेते कहे तबहीँते चित्तमें चेतकरौ । सबेरेते कह्योँ
ताको भाव यहहै कि, जब काल नियराइ आवैगो तब कछू न करत बनैगो
तिहारे फांसिबेको यह माया बहुत परपंच कियो है ॥ १ ॥ पहिले पाखंड-
१८

( २७४ ) बीजक कबीरदास ।
रूप जो वह धोखाब्रह्म है ताको रच्यो तामें मिलिकै तिरगुण जे सत रज तम
हैं तिनको तिहारे फांसिबेको प्रकट कियो । सो तीनों गुणाभिमानी जे तीनों
देवता हैं अरु पाखंडरूप जो धोखा ब्रह्म है तामें सब भूलिगये । घरको
खसम जब स्त्रीको बधिक कहे दुःख देन लाग्यो मारन लाग्यो तब स्त्री कहा
करै । तैसे जो राजा प्रजाको बधिक कहे मारन लाग्यो दुःख देन लाग्यो तब
बिचारे प्रजा कहा करें । सो यह मनतो सबको मालिक ह्वै रह्योहै सो यही
ने सबको दुःख देन लाग्यो तौ जीव कहाकरै ॥ २ ॥
भक्ति न जानै भक्त कहावै तजि अमृत बिष कैलिय सारा।
आगे बड़े ऐसही भूले तिनहुं न मानल कहा हमारा ॥ ३ ॥
भक्तिको तो जानै नहीं हैं भक्त कहावै हैं । अमृत जो है परमपर पुरुष
श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ताको छोड़िकै विष जो है और और की भक्ति ताको
सारमानि लियोहै सो आगे जे बड़ेबड़े ह्वैगये हैं तेऊ ऐसेही भूलिगये हमारो
कह्यो नहीं मान्यो साहबकी भक्ति छोड़िकै और की भक्ति करिकै संसारही
में परतभये ॥ ३ ॥
कहल हमारा गांठी बँधो निशि वासरहि होहु हुशियारा ।
ये कलिके गुरु बड़ परपंची डारि ठगौरी सब जग मारा ४
सो हमारो कहो गांठीबांधो । जो अबहूं हमारो कह्यो न मानौगे साहबकी
भक्ति न करोगे तौ संसारही में परौगे । कलियुगके जे गुरुवा हैं ते बड़े पर-
पंची हैं सब जगका ठगौरी कहे ठगिकै परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनकी
भक्तिको छोड़ाइकौ और और मतनमें डारिदेइहैं । सो निशिबासर हुशियार रहो
अर्थात् निशिबासर रामनामको स्मरण करतरहो साहबको जानतरहो गुरुवा
लोगनको कहा न मानो ॥ ४ ॥
वेद किताव दोय फंद पसारा ते फंदे पर आप विचारा ।
कह कबीर ते हंस न विछुरे जेहि मैं मिलो छोड़ावन हारा ५॥
वोई जे गुरुवालोगहैं तेये वेद किताबको फंदा पसारि कै नाना मत में गुरुआई
करतभये । सो वहींफंदमें आप परतभये औ औरहू को वहींफंदमें डारिकै नानाम-

शब्द । ( २७५ )
तनमें लगाय देने भये । वेद किताबको तात्पर्य न जानतभये । सो कबीरजी
कहैंहैं कि, जौने जीवको मैं फंदते छोड़ायनहार मिल्योहों औ परमपुरुषमें लगाइ
दियो ते आजलौं नहीं विछुरे न बिछुरैंगा। सो तुम्हहूं पारिखकरिके मेरोकह्यो मानिकै
हे हंसजीवो! तुम्हहूं फंद छोड़ि परमपुरुष परजेश्रीरामचन्द्र हैं तिनमें लगौ ॥५॥
इति बत्तीसवां शब्द समाप्त ।
अथ तेंतीसवां शब्द ॥ ३३ ॥
हंसा प्यारे सरवर तेजे जाय ।
जेहि सरवर विच मोतिया चुनते बहु विधि केलि कराय १
सूखे ताल पुरइनि जल छोड़े कमल गयो कुंभिलाइ ।
कह कबीर जो अबकी विछुरै बहुरि मिलै कब आइ॥ २ ॥
हे प्यारे हंस ! सरवर जो शरीरहै ता तेजे जाय कहे जिनके शरीर छूटि-
जायहैं । जौने सरवर शरीरको प्राप्तहोइकै मोतिया चुनै हैं कहे ज्ञान योगादिक
साधन करिकै मुक्तिकी चाहकरै हैं औ बहु विधिकी केलि करै है । जो त्याजे
पाठहोय तौ या अर्थ है । हे हंसाजीव ! प्यारो जो सरवर शरीर ताकोत्यागे
जायहै जौन सरवर शरीरमें नाना देवतनकी उपासनारूप मोती चुने नाना
विषयनको भोग कीन्हे सो छोड़ेजायहै ॥ १ ॥ सोशरीररूपी ताल जब सूख्यो
कहे रोग करिके ग्रस्तभयो तब पुरइनि जल छोड़ि दियो अर्थात् वह ज्ञान
बुद्धि तुम्हारे न रहिगयो । अरु अनुभव तो तुमकरतहो सोई कमलहै सोकुं-
भिलाइगयो अर्थात् भूलिगयो सो कबीरजी कहैं कि, यहि तरहते जो अबकी
बिछुरै कहे शरीर छूटिजाय तब पुनि कबै ऐसो शरीर पावैगो । चौरासीलाख
योनि भटकेगो तब फेरि कबहूं जैसे तैसे मिलैगो शरीर छूटे ज्ञान योगादिक साधन
भूलिजाय हैं । तेहिते मानुष शरीर पायकै साहबको जानै । वह शरीरहू छूटे
नहीं भूलै है काहेते कि साहबही अपनो ज्ञान देइहै औ हंसस्वरूप देइहै ॥ २ ॥
इति तेंतीसवां शब्दसमाप्त ।

(२७६) बीजक कबीरदास ।
अथ चौंतीसवां शब्द ॥ ३४ ॥
हरिजन हंस दशा लिये डोलैं।निर्मल नाम चुनी चुनि बोलैं १
मुक्ताहल लिये चोंच लोभावै।मौन रहै की हरि गुण गावै॥२॥
मान सरोवर तटके वासी।राम चरण चित अंत उदासी ॥३॥
काग कुबुद्धि निकट नहिं आवै।प्रति दिन हंसा दर्शन पावै४॥
नीर क्षीरको करै निवेश।कह कबीर सोई जन मेरा ॥ ५ ॥
जे साहबको नहीं जाने हैं तिनको कहिआये अब जे साहबको जानै तिनकी
दशा कहैं ॥
हरि जन हंस दशा लिये डोलैं।निर्मल नाम चुनीचुनी बोलैं १
हरिजे.परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं तिनके जे जन हैं ते हंस दशा जो है
शुद्धजीव पार्षद रूपता तौनी दशाको लिये सर्वत्र डोलै हैं कहे फिरै हैं । यहां
हरि जो कह्यो ताको हेतु यह है कि, अपने भक्तनकी सिगरी बाधाहरै सोहरि
कहावै है । सो परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र उनकी सिगरी बाधा हरिलेइहैं तब
तिनके जन सुख पूर्वक संसारमें फिरै हैं, उनको संसार स्पर्श नहीं करै है ।
अरु जो नाम माया सवलित है तिनको छोड़िदेइहै औ निर्मल जो नाम राम
नामहै मन बचनके परे अमायिक ताको चुनिचुनि कहे साहब मुख अर्थ ग्रहण
करिके औ संसारमुख अर्थ छोड़िके बोलै है कहेरामनाम उच्चारण करै हैं । यहां
मनबचनके परे जो नाम है ताको कैसे बोलै है ऐसो जो कहो तो ये हंस दशा-
लिये डोलै है कहे जब शुद्ध जीव रहिजाय है तब साहब अपनी इन्द्रिय देइहैं
तिनते तौने नामको बोले है। जैसे सूमा जरिजायहै तब वाकी ऐंठनभर रहिजा-
इहै । तैसे यहशरीरकी आकृतिमात्र रहि जाइहै वह पार्षदही शरीरमें स्थितरहैहै
जब शुद्ध शरीर है जाइहै तब आपनो पार्षदरूप पावैहै यह आगे लिखि आये हैं॥ १॥
मुक्ताहललिये चोंचलोभावै । मौनरहै की हरिगुणगावै॥२॥
हंस मुक्ताहल चोंच में लिये बचनको लोभावै है जौन मांगै है ताके मुंहमें
डारिदेइहै । ऐसे साधुन्के मुखमें पांचमुक्तिहैं १ सामीप्य २ सारूप्य ३

शब्द । ( २७७ )
सायुज्य ४ सालोक्य ५ साष्टर्च तिनते जीवको लोभावै है कहे संब यह जाने है
कि इनहींकी देई दैजाइहै । जो जौनमुक्तिकी चाहकरिकै उनके समीप जाइहै ।
ताको श्रीरामनामके उपदेश करिकै तौन भाव बताइकै मुक्ति देइहैं । औ
आर मौनही रहै है कि, साहबके गुणगाइकै छके रहै हैं ॥ २ ॥
मान सरोवर तटके वासी।राम चरण चित अंत उदासी॥३॥
हंस जेहैं ते मानसरोवरके तटकेवासी हैं अरु वे साधुकैसे हैं कि मनरूपी जो
सरोवरहै ताके तटके वासीहैं कहे मनते भिन्न ह्वै रहैहै जामें हंसकी दशा है साह-
बकी दीन ऐसोजो चित्मात्रआपनो स्वरूपहै ताको परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं
तिनहींके चरणनमें लगाइ राखैहैं अरुअंत उदासी कहे जो वह धोखा ब्रह्ममें अहं
ब्रह्मास्मि मानिकै आत्माको अंत ह्वै जाइहै आपै ब्रह्म मानिलेइहै वहजो है आत्मा
के अंत ह्वैबेको मन धोखा तेहित

( २७८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ पैंतीसवां शब्द ॥ ३५ ॥
हरि मोरपीवमैंरामकीबहुरिया।राममोरबड़ामैंतनकीलहुरिया १
हरिमोररहँटामैरतनपिउरिया।हरिकोनामलैकातलबहुरिया २
छःमासतागवर्षदिनकुकुरी।लोगबोलेभलकातलबपुरी॥३॥
कहै कबीर सूत भल काता।रहँटा न होय मुक्तिको दाता॥४॥
हरि मोरपीवमैंरामकीबहुरिया।राममोरबड़ामैंतनकीलहुरिया १
मोर पीव हरि है । पीव कहे वे मोको प्यारहैं मैं उनकोऊ प्यार हैं ।
अरुमैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्र की बहुरिया कहे नारी हौं । यहां नारी कह्यो
सो यह जीव साहबकी चितंशक्ति है तामें प्रमाण कबीरजीके आदि टकसार
ग्रन्थ को ॥ “आतम शक्ति सुबश है नारी । अमर पुरुष जेहि रची धमारी
॥ १ ॥ दूसरो प्रमाण सायर बीजकको ॥ “ दुलहिनि गाऊ मंगलचार ।
हमारे घर आये राम भतार ॥ तनरति करि मैं मनरति करिहौं पांचो तत्व
बराती । राम देव मोरे ब्याहन ऐहें मैं यौवन मद माती ॥ सरिर सरोवर
बेदी करिहौं ब्रह्मा वेद उचारा।राम देव संग भांवरि लेहौं धन २ भाग हमारा ॥
सुर तेंतीसौ कौतुक आये मुनिवर सहस अठाशी । कह कबीर हम ब्याह
चले हैं पुरुष एक अबिनाशी ॥ २ ॥ अरु श्रीरघुनाथजी मोरबड़ेहैं अरु मैं
तनकी लंहुरियाहौं, कहे उनके शरीर सर्वत्र व्यापक बिभुहैं औ मैं अणुहौं
तामें प्रमाण ॥ अणुमात्रोप्ययंजीवःस्वदेहंव्याप्यतिष्ठति । इतिस्मृतिः ॥ १ ॥
हरिमोररहँटामैरतनपिउरिया।हरिकोनामलैकातलबहुरिया
अरु हरिजै परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते मोर रहँटा कहे चित् अचित्तरूपतें
जगतबोई हैं । अरुमैं रतनपिउरियाहौं यह जगत् जीवंही के वास्ते बन्योहै॥
“जीव सूत ह्वैकै लपटि रहै हैं । मैं रतनकी पिउरियाहौं तामे मैं नहीं लपटौहौं।
हरिजे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको नाम लैके बहुरिया कहे उलटिकै मैं कात्यो अर्थात्
जगत्को जगद्रूप करिकैनहीं देख्यो जगत्को चित् अचितरूप करिकै देख्यो है
रामनाममें बहुरिकै साहब मुखअर्थ देख्यो जगत् मुखअर्थ नहीं ग्रहणकियो ॥२॥

शब्द । ( २७९ )
छः मासतागवर्षदिनकुकुरी। लोग कहल भलकातलवपुरी ३
छः महीनामें एक ताग कात्यो, छःमहीनामें एक ताग और कात्यो तब
वर्षदिनमा एक कुकुरीभै दोनों ताग मिलायकै । अर्थात् छः महीनामें अपनौ
स्वरूप समुझ्यो कि, मैं साहबकी नारीहौं औ छः महीनामें मैं साहबको
स्वरूप समुझ्यो । वर्षदिनमें साहबको मिल्यो सो मैंतो इतनीदेर करिकै मिल्यो
साहब तो हजूरहरि हैं ताहूमें लोग कहै हैं कि, वपुरी भलकात्यो जो अनंत-
कोटि जन्मते नहींजानैहै सोसाहबको वपु आपनो वपु वर्षै दिनमें समुझ्यो ॥३॥
कहै कबीर सूत भल काता । रहँटा न होय मुक्तिको दाता ॥४॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जौने रहँटा जगतते सूत भल कात्यो है । कतवैया
कबीरजीको विवेकहै सो रहँटा न होय यह मुक्तिको दाताहै, काहेते कि, जब
शुद्ध आत्मा रह्योहै याको परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं न तिनको ज्ञानरह्यो औ न
संसारको ज्ञानरह्यो यह शुद्धरूप भरो रह्यो है तामें प्रमाण ॥ “नित्यः
सर्वगतस्थाणुरचलोयं सनातनः” ॥ इतिगीतायाम् ॥ जब यह याके मन भयो
तब संसारको कात्योहै औ संसारमें परिकै दुःख सुख भोग कियो है । औ
जब पूरागुरु मिल्योहै तब परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको पाइकै संसारते
छूटिगयोहै औ पुनि संसारमें नहींआयो । सो कबीरजी कहै हैं कि यह रहँटा
कहे संसार न होय मुक्तिको दाताहै जो संसार बुद्धि करिकै देखैहै सो संसारमें
रहै है औजो संसारको साहबको चित अचितरूप करिकै देखैहै ताको मुक्तिही
देइहैं या संसारमें आये मुक्त भयोहै ॥ ४ ॥
इति पैंतीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छत्तीसवां शब्द ॥ ३६ ॥
हरि ठग जगत ठगौरी लाई। हरि वियोग कस जियहु रे भाई १
कोकाकोपुरुषकौनकाकीनारी।अकथकथायमजालपसारी २
को काको पुत्र कौन काको बापा । कोरे मरै को सहै संतापा ३

( २८० ) बीजक कबीरदास ।
ठगि ठगि मूल सबनको लीन्हा। राम ठगौरी विरलै चीन्हा ४
कह कबीर ठगसो मन माना। गई ठगौरी ठग पहिचाना॥५॥
हरिठगजगतठगौरीलाई । हरिवियोगकसजियहु रेभाई॥१॥
हरिठग कहे हरिरूप द्रव्यके चोरावरनहारे गुरुवालोगते जगत् में ठगौरी
लगाइकै कहे उपदेश करिकै जीवको ठगि लेइहैं और और में लगाइकै सो
हेजीवो ! हरिके वियोगते तुम कैसे जिऔहौ ॥ १ ॥
कोकाकोपुरुषकौनकाकीनारी। अकथकथायमजालपसारी ॥
कोकाकोपुत्रकौनकाकोबापा। कोरेमरै कोसहैं संतापा॥२॥
यहसंसारमें जबसांचे साहबको भूल्यो तबको काको पुरुषहैको किसकी नारी हे
अकथकथा कहे कहिवेलायक नहीं है काहेते कि जिनकी उपासना करै हैं आपन
स्वामीमानैहैं तिनके स्वामी कबहूंहोयहै वोई याकी नारीहोयहै दासहोइहै

शब्द । ( २८१ )
अथ सतीसवाँ शब्द ॥ ३७ ॥
हरिठगठगत सकलजगडोला।गवनकरतमोसोंमुखहुनबोला
बालापनके मीत हमारे । हमें छोड़ि कहँ चले सकारे॥२॥
तुम अस पुरुष हौं नारि तुम्हारी।तुम्हारि चाल पाहनहुँते भारी
माटिक देह पवनको शरीरा।हरि ठग ठगतसोडर ल कबीरा४
हरिठगठगतसकलजगडोला।गवनकरतमोसोंमुखहुनबोला १
जीव कहे हैं कि, हरिको ठग जो गुरुवाहै सो ठगहारी करिकै सब जीवन
को ठगतकहैं हरिते विमुख करत जगडोलाकहे संसारमें फिरै है । अरु जब
गमनकरनलगे यम घेरिलियो तब मोसों मुखहूते न बोले कि, एतेदिन जौने
जौनमें लगेरहे ब्रह्ममें अथवा जीवात्मामें ते न बचायो । यह खबरिकहि समु-
झाय न दियो कि, हम को धोखा हैगयो तुमहूं धोखामें न परौ ॥ १ ॥
बालापनके मीत हमारे । हमें छोड़ि कहँ चले सकारे ॥२॥
तुमअसपुरुष हौं नारितुम्हारी।तुम्हारी चालपाहनहुँतेभारी
सो तुम बालापनके हमारे मीतहौ जबभर रह्यो जियो तबभर हमको धोखाही-
में लगायेरहे अब हमें छोड़िकै सकारे कहे हमहींते आगे कहांजाहुगे काहेते
कि, तुमतो काहू को रक्षक मान्यो नहीं वही धोखामें लगेरहे, आपही को
मालिक मानेरहे, अब तुम्हारी रक्षा कौन करै ? सो जब तुम्हारी कोई न कियो
यम लैहीगये तौ जौन ज्ञान हमको दियो है तौनेते हमारी रक्षाकौन करैगो॥२॥
तुम ऐसो हमारे पुरुषहै तुम्हारी हम नारी हैं काहेते कि, बीजमंत्र हम को
उपदेश दियो है सो तुम्हारी चाल पाहनौते भारी है कहे पाहनौ ते जड़ है तेहिते
साहबको भुलाइदियो ॥ ३ ॥
माटिकि देह पवनकोशरीरा।हरिठग ठगतसोडरलकबीरा४
माटीकी यह देह है सो स्थूल शरीर नाशवानहै औ पवनको शरीर सूक्ष्म
शरीर है सो मनोमय चंचलहै ज्ञानभये वहौ नाशमानहै तामें स्थित जे कबीर कहे

( २८२ ) बीजक कबीरदास ।
कायाकें बीर जीवहैं ते हरि जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्रहैं सबके कलेश हरनवारें
तिनको ठग जे गुरुवालोग हैं तिनके ठगतमें कहे रक्षकको छपायदेतमें जीवडरै
है कि, हमारी रक्षा अब कौन करैगो, वह ब्रह्म तो धोखई है वा तो गुरुबनहीं-
की रक्षा नहीं कियो औ तेई मालिक होतो तौ मायाके बश कैसे होते औ यम
कैसे धरि लैजाते ॥ ४ ॥
इति सैंतीसवां शब्द समाप्त ।
अथ अड़तीसवां शब्द ॥ ३८ ॥
हरि बिनु भर्म बिगुर बिन गन्दा ।
जहँ जहँ गये अपन पौ खोये तेहि फन्दे बहु फंदा॥१॥
योगी कहै योग है नीको द्वितीया और न भाई ।
चुण्डित मुण्डित मौन जटा धरि तिनहुं कहां सिधिपाई२
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ये जो कहहिं बड़ हमहीं।
जहँसे उपजे तहँहि समाने छूटिगये सब तवहीं ॥ ३ ॥
बायें दहिने तजो विकारै निजुकै हरि पद गहिया ।
कह कबीर गूंगे गुर खाया पूंछे सों का कहिया ॥ ४ ॥
या पदमें जें जीवनको गुरुवा लोगनको उपदेश लग्यो है तिन को कहै हैं
औ गुरुवा लोगनको कहैं ॥
हरि बिनु भर्म विगुर बिन गंदा ।
जहँ जहँ गये अपन पौ खोये तेहि फंदे बहु फंदा ॥ १ ॥
मलिन बुद्धि जाकी होइ है ताको गंदा कहै हैं सो गंदा जो यह जीवहै सो
बिना जाने भर्मते बिगारि जात भयो ताते चिन्मात्र हरि को अंशजो यहजीव
ताकी नीचं बुद्धि होइगई । जहांगयो तहां तहां अपनपौ कहे मैं सांचे साह-
बको हौं यहज्ञान खोयकै तौने फन्दामें परिकै तौने मतमें लगिकै बहुत फन्द
जे चौरासी लाख योनिहैं तिनमें भटकत भये ॥ १ ॥

शब्द । ( २८३ )
योगी कहै योग है नीको द्वितीया और न भाई ।
चुंडित मुंडित मौन जटा धरि तिनहुं कहां सिधि पाई २॥
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ये जो कहहिं बड़ हमहीं ।
जहँसे उपजे तहँहिं समाने छूटिगये सब तबहीं ॥ ३ ॥
जिनको जिनको यह पदमें कहि आये तेते आपने मतको सिद्धांत करतभये
कि, हमारही मत सिद्धांतहैं । परन्तु रक्षकके विनाजाने जहां ते उपजे तहँ
पुनि समाइ जानभये । अर्थात् जा गर्भते आये तौनेही गर्भमें पुनि गये, जन-
नमरण नहीं छूटै है । जब दूसरा अवतार लियो तब जौने जौने मतमें आगे
सिद्धांत करिराख्यो तेने मन सब छूटिगये । अथवा जहांते उपजे कहे जौने
लोक प्रकाशते उपजे हैं तहँ समाने महाप्रलयमें तब सब बिसरिगयो ॥ ३ ॥
वायें दहिने तजो विकारै निजुकै हरि पद गहिया ।
कह कबीर गूंगे गुरखाया पूंछेसों का कहिया ॥ ४ ॥
सो मंत्र शास्त्रमें जे वाममार्ग दक्षिण मार्ग हैं ते दोऊ विकारई हैं तिनको
दुहुनको छोड़िदेउ औ हरिजे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिहारे रक्षा करनबारे
तिनके पदको निजुकै कहे आपन मानिकै गहौ अथवा निजुकै कहे बिशेषिकै
तिनके पदको गहौ । जो कहो उनको बताइदेउ वे कैसे हैं तौ वे तौ मन बचनके
परे हैं उनको कोई कैसे बताइसकै । जो उनको जान्यो है ताको गूंगे कैसो
गुर भयो है कछू कहि नहिं सकै है इशाराहिते बतावै है । वेदशास्त्रको तात्पर्य
कै जो सज्जनलोग साहबको समुझावै हैं सोतात्पर्य वृत्तिही करिकै बतावै हैं ऐसे
तुमहूं जो भजन करोगे तौ तुमहूँ उनको जानि लेउगे कि ऐसे हैं ॥ ४ ॥
इति अड़तीसवां शब्द समाप्त ।
अथ उनतालीसवां शब्द ॥ ३९ ॥
ऐसे हरिसों जगत लरतूहै । पंडुर कतहूं गरुड़ धरतुहै॥१॥
मूस बिलारी कैसे हेतू । जम्बुककर केहरिसों खेतू ॥ २ ॥

(२८४) बीजक कबीरदास ।
अचरज यक देखा संसारा।सोनहा खेद कुंजर असवाग ॥३॥
कह कबीर सुनो संतो भाई। यह संधि कोइ विरलै पाई ॥४॥
ऐसे हरिसों जगत लरतुहै । पंडुर कतहुं गरुड़ धरतुहै ॥१॥
जैसे पूर्व कहिआये ऐसे रक्षक हरिसों जगत् लरतुहै कहे विरोध करतुहै ?
औ जे उनके भक्त उनको बतावै हैं तिनके मतको खंडन करै है। सो हे मूढ !
पंडुरकहे पनिहां पियरसर्प कहूं गरुड़को धरतुहै ? जो “डुंडुभ” पाठहोय तौ
डुंडुभ पनिहां सर्पका नामहै । सो रामोपासना गरुड़ है सो और मत जे सर्प
हैं तिनको कहां खंडनकीन होइहै वही सबको खंडन करनवारो है । जो वाकों
(रामोपासना को) मत अच्छी तरहते जानो होइ है ॥ १ ॥
मूस बिलारी कैसे हेतू । जंबुक कर केहरि सों खेतू ॥ २ ॥
सो हे जीवो ! तुम्हारो ज्ञानतौ मूस है औ गुरुवालोगन को ज्ञान बिलारीहै।
जे और और मतमें लगावै हैं तुमको और और मतमें लगाइकै खाइलेइंगे
तिनसों तुमसों कैसे हेतुभयो । जंबुक जो सियार सो केहरि जो सिंह है तासो
खेत करै है कहे लरैहै । सो जंबुक अज्ञान है सो सिंहजो तुम्हारो जीव सो लरैहै
वह सिंह जीव कैसो है अज्ञान को नाश कै देनवारोहै अर्थात् जब आत्माकों
ज्ञान होइ है तब अज्ञान नाश ह्वै जाइहै ॥ २ ॥
अचरज यक देखा संसारा। सोनहा खेद कुंजर असवारा॥३॥
कह कबीर सुनो संतो भाई। यह संधि कोई बिरले पाई ॥४॥
सो हम यह बड़ा आश्चर्य देख्योहै । सोनहा जो कूकुर सो कुंजर के अस-
वारको खेदै है । सो नानामतवारे जे हैं तेई कुत्ते हैं ते काउं काउं कहैं
शास्त्रार्थ करिकै कुंजरके असवार जे हैं रामोपासनाके साधक तिनको खेदैहैं ।
कहे उनसों वे कछुनहीं पावैहैं । यहां कुंजर मन है ताको परम पुरुष श्रीराम-
चन्द्र लगाइदियेहैं औ आप असवार हैं ॥ ३ ॥ सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि,

हे संतो भाई ! तुम सुनौ मनते भिन्नह्वैकै साहबके मिलबेकी जोहै संधि भेद
ताको कोई बिरला पायेहै अर्थात् जबभर मन बनोरहै है तबभर वाको भूलिवे-
की संधि बनीही रहै है, मनते भिन्न ह्वैकै वाके भजन करिवेको उपायकोई
बिरला जानैहै ॥ ४ ॥
इति उनतालीसवां शब्द समाप्त ।

अथ चालीसवां शब्द ॥ ४० ॥
पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
रामके कहे जगत गति पावै खांड़ कहे मुख मीठा॥१॥
पावक कहे पाव जो दाहै जल कहे तृषा बुझाई ।
भोजन कहे भूख जा भाजै तौ दुनियाँ तरिजाई ॥२॥
नरके संग सुवा हरि बोलै हरि प्रताप नहिं जानै ।
जो कबहूं उड़िजाय जँगलको तौ हरि सुरति न आनै ३
बिनु देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिये का होई ।
धनके कहे धनिक जो होतो निर्धन रहत न कोई ॥४॥
सांची प्रीति विषय मायासों हरि भगतनकी हांसी ।
कह कबीर यक राम भजे बिन वांधे यमपुर जासी॥५॥

पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
रामके कहे जगत गति पावै खांड़ कहे मुख मीठा॥१॥
सो हे पंडितौ जो बाद बदौहौ सो झूठाहै काहेते कि, पंडिततो वह कहावै
है जाके सारासार बिचारिणी बुद्धि होइहै सो सारासार बिचारिणी बुद्धि तों
तिहारे है नहीं पंडित भर कहावौहौ । काहेते कि, सारशब्दको झूठा कहौहौ
यह बाद बदिकै रामके कहेते जो गति पावतो तौ खांड़ाकेहे मुखमीठ हैजातो॥ १॥

( २८६ ) बीजक कबीरदास ।
पावक कहे पाव जो दाहै जल कहे तृषा बुझाई ।
भोजन कहे भूख जो भाजै तौ दुनियां तरिजाइ ॥ २ ॥
नरके संग सुवा हरि बोलै हरि प्रताप नहिं जानै ।
जो कबहूं उड़िजाय जंगलको तौ हरि सुरति न आनै ॥३॥
जो पावकके कहे दाह पावतो तो जीभ जरिजाती, औ जलके कहे तृषा
बुझाइ जाती, औ भोजनके कहेते भूख भाजिजाती तौ, रामके कहेते दुनियाँ
तरिजाती ॥ २ ॥ नरके पढ़ाये सुवा राम राम कहैहै औ श्रीरामचन्द्रको
प्रताप नहीं जानै है, काहेते कि, जब कबहूं जंगलमें उड़िजाय है तब रामकी
सुरति नहींकरै है । ऐसे जोतुम रामनाम कहि हरिको प्रताप जाना चाहोगे
तो कैसे जानौगे ॥ ३ ॥
बिन देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिये का होई ।
धनके कहे धनिक जो होतो निर्धन रहत न कोई ॥ ४ ॥
बिना देखे बिना स्पर्श किये नाम लिये कहा होइहै । अर्थात् जो कोई दूर-
होइ औ देखै न स्पर्श न होइ औ जो वाको नामलेइ तौ का जानि लेइहै ?
नहीं जानै है । धनके कहेते कोई धनिक ह्वैजातो तौ निर्धनी कोई न होतो
ऐसे नाम लिये जो मुक्ति होत तौ सब मुक्तै होइजात । सो हे पंडितौ तुम
ऐसे असंगत दृष्टांतदैके यहवाद बदौहौ सो झूठा है । काहेते कि, रामनाम तौ
मन बचनके परे है औ ये सब बचन में आवै हैं । औ वह राम नाम साहबके
दियेते स्फुरित होइहै । यहै रामनाम जपते औ ये सब अनित्य ह्वैजाइहैं ॥ ४ ॥
सांची प्रीति विषय मायासों हरिभक्तनकी हासी ।
कह कबीर यक राम भजे बिनु बांधे यमपुर जासी ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैं हैं कि, हे नास्तिक पण्डितौ ! विषय मायासों सांचीप्री-
ति करौहौ औ ऐसे ऐसे कुबाद बदिकै हरिभक्तनकी हासी करौहौ; नाम रूप
लीला धामको खण्डन करिकै । सो एक जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनके
नामके बिना भजन किये बांधे मोगरन की मार सहत यमपुरहीको जाहुगे ।

शब्द । (२८७)
जे परमपुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र तिनते विमुख हैं ते सब लोकनमाँ निन्दित
हैं तामें प्रमाण-“ यश्चरामनपश्यत्तुयंचरामो नपश्यति । निन्दितस्सर्वलोकेषु
स्वात्माप्येनंविगर्हते ” ॥ ५ ॥
इति चालीसवां शब्द समात ।
अथ इकतालीसवां शब्द ॥ ४१ ॥
पण्डित देखौ मनमो जानी ।
कहुधौं छूति कहांते उपजी तवाहिं छूति तुम मानी ॥ १ ॥
नादै विन्दु रुधिर यक संगै घटहीमें घट सज्जै ।
अष्ट कमलकी पुहुमी आई यह छूति कहां उपज्जै ॥ २ ॥
लखचौरासी बहुत वासना सो सब सरिभो माटी ।
एकै पाट सकल बैठारे सींचि लेत धौं काटी ॥ ३ ॥
छूतिहि जेंवन छूतिहि अचवन छूतिहि जग उपजाया ।
कह कबीर ते छूति विवर्जित जाके संग न माया ॥ ४ ॥
पंडित देखौ मनमो जानी ।
कहुधौं छू

( २८८ ) बीजक कबीरदास ।
और जहां जहांकी बासना करिकै मरै है तौनी तौनी योनिमें प्राप्त होइ है एकै
जीव बासनन करिकै सर्वत्र होइहैं यह छूति कहांते उपजै है ॥ २ ॥
लख चौरासी बहुत वासना सो सब सरिभो माटी ।
एकै पाट सकल बैठारे सींचिलेत धौं काटी ॥ ३ ॥
यह जीव बहुत बासननमें परिकै चौरासी लाख योनिमें भटकैहै शरीर स-
रिकै माटी है जायहै एकै पाटमें कहै जगत्‌में नानां वासना करिकै
माया सबको बैठावतभई कहे शरीरधारी सबको करतभई अरु ये शरीर सब-
माटीही आई औ माटीमें मिलि जाइँगे औ जीव सबके एकही हैं औ एकही
पाटमें बैठे हैं सो वे जलको सींचिकै छूति काटि लेत हैं का जल सींचे छूति
मिटि जातहै ? नहीं मिटै ॥ ३ ॥
छूतिहि जेंवन छूतिहिअचवन छूतिहि जग उपजाया ।
कह कबीर ते छूति विवर्जित जाके संग न माया ॥ ४ ॥
सो वही छूति जो है बासना सो जब उठी तब जेंवन कियो औ वही वासना
उठी तब अँचयो । और कहांलौं कहैं वही बासना ते जगत् उपज्यो है । सो
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जाके संग माया नहीं है सोई वासनारूपी छूतिके
विवर्जितहै । सो हे पंडित ! माया को जो तुम छोड़यो नहीं छूति तिहारे
भीतर घुसी है ऊपर के छूति माने कहा होइ बड़ी छूतिकियो है बासनैते
चित्तकी वृत्ति उठै है तब यह मानै है कि, हम ब्राह्मणहैं क्षत्री हैं वैश्य
हैं शूद्रहैं ॥ ४ ॥
इति इकतालीसवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( २८९ )
अथ बयालीसवां शब्द ॥ ४२ ॥
पंडित शोधि कहहु समुझाई जाते आवागमन नशाई ॥
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौनदिशा वसभाई ॥ १ ॥
उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम स्वर्ग पतालके माहे ।
बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूं नरक जात धौं काहे ॥ २ ॥
अन जानेको नरक स्वर्ग है हरि जानेको नाहीं ।
जेहि डरको सब लोग डरतहैं सो डर हमारे नाहीं ॥ ३ ॥
पाप पुण्य की शंका नाहीं स्वर्ग नरक नहिं जाहीं ।
कहै कबीर सुनो हो संतो जहाँ पद तहां समाहीं ॥ ४ ॥
वासना मायाके योगते होइहै सो माया जौनी प्रकारते छूटै है सो
उपाय कहै हैं अरु आचारको वहां खंडन करिआये सो अब जौनी दशामें अचार
नहीं है सो कहै हैं ॥
पण्डित शोधि कहहु समुझाई। जाते आवा गमन नशाई॥
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई ॥१॥
उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम स्वर्ग पतालके माहे ।
बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूं नरक जात धौं काहे ॥ २ ॥
हे पंडित! तुम तो सारासारको बिचार करौहौ सो तुम शोधिकै मोसों समुझाय
कहो जाते यह जीवात्माको आवागमन नशाइ । अर्थ धर्म काम मोक्ष ये फल
कौनी दिशामें रहै हैं? ॥ १ ॥ उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम स्वर्ग पाताल यहां
सर्वत्र मैं ढूंढ़ि डार्यों परन्तु विना गोपाल कहूं ठौर न देख्यों गोपाल कहे गों
जो इन्द्रिय जड़ मनादिक तिनके चैतन्य करनवारे जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहे
तिनहींको सर्वत्र देखत भयो । विषय इन्द्रियनते देवता मनते मन जीवते जीव
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रते चैतन्यहै सो जीव उनको चित्त शरीर अरु मायाकाल
१९

( २९० ) बीजक कबीरदास ।
कर्म स्वभाव उनको अचित शरीरहै तेहिते बिना गोपाल कहूं ठौर नहीं है। जीव
नरक स्वर्ग जायहै सो अब बतावैहैं ॥ २ ॥
अन जानेको नरक स्वर्ग है हरिजानेको नाहीं ।
जेहि डरको सब लोग डरत हैं सो डर हमरे नाहीं॥३॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि अनजानेको नरक स्वर्ग है कहेनो कोई हरिको नहीं
जानैहै ताको स्वर्गहै और नरकहै । और जो कोई हरिको सर्वत्र जानैहै ताको न
नरकहै न स्वर्ग है । जौन डरको सब लोग डरायहैं माया ब्रह्म नरक स्वर्गादि-
कनको तौन डर उनको नहीं है काहेते वे तो सर्वत्र साहबैको देखैहैं ॥ ३ ॥
पाप पुण्यकी शंका नाहीं स्वर्ग नरक नहिं जाहीं ।
कहै कबीर सुनो हो संतो जहाँ पद तहां समाहीं ॥ ४ ॥
औ न उनको पापपुण्य की शंका है काहेते कि, जो कोई बद्ध होइ सो
मुक्त होइ, तेहिते न वे बद्धही हैं न मुक्तही हैं तामें प्रमाण श्रीभागवते॥"बद्धो-
मुक्तइतिव्याख्या गुणतोमेनवस्तुतः । गुणस्यमायामूलत्वान्नमेमोक्षोनबंधनम्” ॥
हम तो सर्वत्र साहबहीको देखैहैं वे नरक स्वर्गको नहीं जाइहैं सो कबीर जी
कहैहैं कि हे संतो! सुनो ऐसी भावना जे नर करैं हैं ते नर जहां पद तहां समाहीं
कहे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके अंश हैं सो तिनहीं के स्थानमें जाइ हैं ॥ ४ ॥
इति बयालीसवां शब्द समाप्त ।

अथ तेतालीसवाँ शब्द ॥ ४३ ॥
पंडित मिथ्या करौ विचारा। ना हां सृष्टि न सिरजनहारा १
थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि धरणि न नीरा ।
ज्योति स्वरूपी काल न उहँवां वचन न आहि शरीरा॥२॥
कर्म धर्म कछुवो नहिं उहँवां ना कछु मंत्र न पूजा ।
संयम सहित भाव नहिं एकौ सोतो एक न दूजा ॥ ३ ॥

शब्द । ( २९१ )
गोरख राम एकौ नहिं उहँवां ना ह्वां भेद विचारा ।
हरि हर ब्रह्म नहीं शिव शक्ती तिरथौ नहीं अचारा ॥ ४ ॥
माय वाप गुरु जाके नाहीं सो दूजा कि अकेला ।
कह कबीर जो अबकी समझै सोई गुरू हम चेला ॥ ५ ॥
हे पंडित ! तुमतौ वहि ब्रह्मको मिथ्यै बिचार करोहो। जो यहिपदमें वर्णन
करिआये सो वहमें एकउ नहीं है वह तो धोखाही है सो कबीरजी कहै हैं कि,
जो सो वह आत्माते दूसर है कि अकेल वह ब्रह्महै? जो अबकी समझै कहे यह
ज्ञान भये पर समझै कि, मैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको हौं वह ब्रह्म धोखा है
सोई गुरुहै । म चेलाहौं काहेते कि, मोहिं तो धोखई नहीं भयो है जो आप-
नेको ब्रह्ममानिकै औ साहबको समझै है औ वाको धोखा मानिलेइ सो मेरो
गुरुहै औमैं वाको चेलाहौं अर्थात् सोई मोसों अधिक है काहेते कि, वह धोखा
में परिकै निकस्यो है यह प्रशंसा कियो ॥ ५ ॥
इति तेतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ चवालीसवां शब्द ॥ ४४ ॥
बूझहु पंडित करहु विचारी पुरुष अहै की नारी ॥ १ ॥
ब्राह्मणके घर ब्राह्मणी होती योगीके घर चेली ।
कलिमा पढ़ि पढ़ि भई तुरुकिती कलिमें रहै अकेली ॥२॥
वर नहिं वरै व्याह नहिं करई पुत्रजन्म होनिहारी ।
कारे मूँड़े यक नहिं छाँड़ै अवहूँ आदिकुवांरी ॥ ३ ॥
मायिक न रहै जाइ न ससुरे साई संग न सोवै ।
कह कबीर वे युगयुग जीवैं जाति पांति कुल खोवैं ॥४॥
यह मायाही सब जगतके जीवनको भरमायो है सोई कहैं ॥