कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३०९ )
प्रकाश ब्रह्म नाहीमें सब रहे हैं । जब उत्पत्तिको समय भयो सुरति पायो तब
आपनेको लोकप्रकाश ब्रह्म मान्यो तब मनभयो । मनते इच्छाभई । तब यह
ब्रह्मकहै हैं कि, मैं जीवात्मामें प्रवेश करिकै नामरूप करि हौं। सो जीवात्मामें प्रवेश
करिकै नाम रूप जीवात्माके करतभयो याहीते याको साँई मानिकै चित् शक्ति जीव
सासूर जो संसार तहां आवत भयो । सो वह ब्रह्मको खसम मानि लेबो धोखा-
है काहेते कि, वह तौ निराकारहै सो वाके संग न सोवत भई, न स्वाद पावत भई
नानारूप धरत भई तेई यौवन है जे सपने की नाई जातभये सो जौनी भांति
चितशक्ति जीव सांईके संग ससुरेमें आई सो लिखेहै अपनेको ब्रह्म मान्यो तब
संसार की उत्पत्ति भई तामें प्रमाण कबीरजीके शब्दमंगलको ॥ ( सो उत्पत्ति
बीजहै, शून्य प्रलय कर ठाउं । तन छूटे कह जाइहौ, अकह बजायो गाउँ ॥ १॥)
जना चार मिलि लगनशोचाई जना पांच मिलि मंडप छाई।
सखी सहेली मंगल गावैं। दुख सुख माथे हरदि चढ़ाई॥२॥
जना चार कहे मन बुद्धि चित्त अहंकार ये जे अंतःकरण चतुष्टय हैं तेई
मिलिकै लग्न शोचावतभे अर्थात् जीवको शरीरकी लग्न लगावतभे । औ जनापांचैं
कहें पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश येपांचौं तत्त्व मिलिकै मंडप छावत भये अर्थात्
शरीर बनावत भये । औ सखी सहेली जे हैं पांच कर्मेन्द्रिय ते मंगल गावैंहैं गाइबो
कहाहै कि, रूप रस गंध स्पर्श शब्द ये विषयको लेन लगे । और नाना प्रकारकी
जे पुण्य पापकी वृत्तिहैं तेई कुवांरी कन्याहैं सो नानाप्रकारके पुण्य पाप कराइ-
कै दुःख सुख की हरदी जीवरूप दुलहिनिके माथे चढ़ावै हैं ॥ २ ॥
नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पति आई ।
अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड़ भई संग सांई॥३॥
औ नानारूप कहे नाना भांति की जे वासनाहैं तिनहीकी याके मनमें भांवरि
परिगई है । औ चित् अचित्की गांठी परिगई ताहीते ब्रह्मको पति आई कहे पति
आइ गई है अर्थात् ब्रह्मको पति मानिलियो है कि, वह ब्रह्म मैंहीं हौं । हेतु यहहै