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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

शब्द । ( ३०३ )
अथ इक्यावनवां शब्द ॥ ५१ ॥
बुझवुझपण्डितमनचितलाय।कवहिंभरलवैहैकवहिंसुखाय १
खन उवै खन डुबैखन अवगाहा।रतन नमिलै पावनहिं थाह२
नदिया नाहिं सरस वहै नीर । मच्छ न मरै केवट रहै तीर ३
कह कबीर यह मनका धोका।बैठा रहै चला चह चोखा४
बुझबुझपंडितमनीचितलाय।कबहिंभरलवैहैकवहिंसुखाय १
हे पंडित ! सारासारके बिचार करनवाले ते तो विवेकी कहावै हैं चित्त
लगाइकै यह मनको बूझि, तौ कबहूं भरलकहे कबहूं तो तैं आपनेको मानिले-
इहै कि, मैंही ब्रह्महौं आनंदते भरिजायहै औ कबहूं वहज्ञान बहिजायहै तब
सुखाइ जाइहै अर्थात् वह आनंद नहीं रहिजाइहै ॥ १ ॥
खन उवै खन डुबै खन अवगाह।रतननमिलैपाव नहिंथाह२
नदिया नाहि सरस वहै नीर । मच्छ न मरै केवट रहै तीर ३
तब क्षणमें संसारते मन ऊबिउठै है कहे बैराग्य ह्वैआवै है औ क्षणमें वही
मनरूपी नदी हिलै है बूडिजाय है अर्थात् संसारके विषयमें बूडिजाय है।
औ क्षणमें अवगाहैहै कहे नानामतमें बिचार करै है कि, संसार छूटिजाय सो
मनरूपी नदीकी थाह नहीं पावै है तेहिते रत्न जो है स्वस्वरूप सो नहीं मिलै है
विचारही करत रहिजायहै॥२॥सो मनरूपी नदियाहै नहीं जो तैं विचारकरै तू तो
मनके बाहर है परंतु सरस नीर सङ्कल्पबनै है। अब मच्छको मारनवालो केवट
ज्ञान तीर में बनै है परंतु काम क्रोधादिक मच्छ तेरे मारे नहीं मरैं हैं॥ ३ ॥
कह कबीर यह मनको धोखा। बैठा रहै चला चह चोखा ४
सो कबीरजी कहैहैं कि, नाना मतमें परिकै संसार छूटिबेको नहीं उपाय करौ
हौ औ चोखे कहे नीके चला चाहौहौ परंतु हौ बैठे कहे साहबके मिलिबेको उपाय
ये एकउ, नहीं हैं काहेते कि, पश्चिमको ग्राम नगीचऊ होइ औ तहांजाइबो चाहै औ
जसजस पूर्वको मेहनत करिकै मंजिलकरै तौ, तस तस दूरिही परतु जाइहै यह संसार
मनको धोखा मिथ्याहै सो मनते भिन्न हैकै साहबमें लगै तबहीं साहब मिलैंगे ४
इति इक्यावनवां शब्द समाप्त ।