कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished766 पृष्ठ
पृष्ठ 358, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 358
( ३०८ ) बीजक कबीरदास ।
- वृक्षमें बेलि लपटै है सो यह संसाररूपी वृक्षमें आशारूपी बेलि लपटि गई
है तामें बँधिकै प्राणी छूटै नहीं है ॥ ४ ॥ साहब कहै हैं कि. हे कबीर !
कहै जीव तोको संसार जातमें हम पुकारा है रामनामको जो पंडित होइ है
बिचार करिलेइ अर्थात् असार जो रामनाममें जगत् मुख अर्थ ताको छोड़ि
राममें सार जो मैं ताको जानिकै रामनाम जपिकै मेरे पास आवै ॥ ५ ॥
इति तिरपनवां शब्द समाप्त ।
अथ चौवनवां शब्द ॥ ५४ ॥
सोईके सँग सासूर आई ।
संग न सूती स्वाद न मानी गयो यौवन सपनेकी नाई ॥ १ ॥
जना चारि मिलि लगन शोचाई जना पांचमिलि मंडपछाई।
सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढ़ाई ॥ २ ॥
नाना रूप परी मन भांवरि गांठि जोरि भई पति आई ।
अरघे दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड़ भई सँग साईं ॥३॥
भयो बिवाह चली बिन दूलह वाट जान समधी समुझाई।
कह कबीर हम गौने जैवै तब कंतलै तूर बजाई ॥ ४ ॥
यह जीव परमपुरुष श्रीरामचन्द्रकी शक्ति है सो जौनी भांतिते याको आपने
स्वरूपको ज्ञान रह्यो है औ फिरि भयो है सो लिखै हैं ॥
सांईके सँग सासूर आई ।
सङ्ग न सूती स्वाद न मानी गयो यौवन सपने की नाई १
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके लोकको प्रकाश जो ब्रह्म है ताको सांई मानिकै
ताही सङ्ग सासूर जो यह संसार है तहां आई । सासूर संसार काहेते ठहरयों
कि, अहंब्रह्मबुद्धि संसारहीमें होइहै । जब संसारकेबाहिरे रहै है तबतो याको
सुधिही नहीं रहैहै । जब महाप्रलय है जाइहै तब सत् जो है साहबके लोकको