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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

( ३०४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ बावनवां शब्द ॥ ५२ ॥
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी ।
घोरि घोरि वर्षा वर्षावै परिया बुंद न पानी ॥ १ ॥
चींटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगे खायो ।
उदधि माहिते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ २ ॥
मेढ़क सर्प रहै इक संगै बिल्ली श्वान विवाही ।
नित उठि सिंह सियारसों जूझे अद्भुत कथ्यो न जाही ॥ ३ ॥
संशय मिरगा तन वन घेरे पारथ वाना मेलै ।
सायर जरै सकल वन डाहै मच्छ अहेरा खेलै ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहिं बूझै ।
बिनु पंखै उड़िजाहि अकाशै जीवहि मरण न सूझै ॥ ५ ॥
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी ।
घोरि घोरि वर्षा वर्षावै परिया बुंद न पानी ॥ १ ॥
हे ब्रह्मज्ञानी ! आप बूझिये तौ घोरिघोरि कहे नये नये ग्रन्थन को बनाइकै
कहे माया ब्रह्मजीव एकैमें मिलाइडारचो कि, एक ही ब्रह्म है । वही वाणी
शिष्यनके श्रवण में वर्षा ऐसो वर्षावोहै परन्तु तुम्हारे बानीरूप पानी को बुंदहू
न उनके पर्यो अर्थात् तनकऊं ज्ञान न भयो वे ब्रह्म कबहूं न भयो सो तुम्हारो
यह हवाल हैरह्यो है ॥ १ ॥
चींटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो ।
उदधि माहिंते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ २ ॥
चींटी कहिये बुद्धिको काहेते कि, सूक्ष्म होइ है कुशाग्रवर्त्ती शास्त्रमें कहै हैं ताके
पाइमें मतङ्गरूप जोमनहै ताको बांधिदियो मनबड़ा है। औ दुर्वारमतहै याते हाथीकहो