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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

( २९८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अड़तालीसवां शब्द ॥४८॥
पंडित देखो हृदय विचारी । कौन पुरुष को नारी ॥ १ ॥
सहज समाना घट घट बोलै वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम कहा कहि लीजै ना वहि वरण न रूपा ॥२॥
तैं मैं काह करै नर बौरे क्या तेरा क्या मेरा ।
राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहु धौं काहि निवेरा ॥३॥
वेद पुराण कुरान कितेवा नाना भांति बखानी ।
हिंदू तुरुक जैनि औ योगी एकल काहु न जानी ॥ ४ ॥
छः दरशनमें जो परवाना तासु नाम मन माना ।
कह कबीर हमहीं हैं बौरे ई सब खलक सयाना ॥ ५ ॥
पंडित देखो हृदय विचारी । कौन पुरुष को नारी १
सहज समाना घट घट बोलै वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम कहा कहि लीजै ना वह वरणनरूपा २॥
हे पंडित! तुमतौ सारासारको विचार करौ हौ हृदयमें विचारि कै देखौ तो
कौन पुरुषहै कौन नारीहै वह आत्मा तो न पुरुष न नारी है ॥ १ ॥ जो कहौ
घटघटमें सहज जीव ब्रह्म समाइ रह्योहै वाको चरित्र अनूपहै सोई हमारो
स्वरूप है तो वाको नाम कहां कहि लीजै बाको तो न बर्ण है न रूपहै वह
तो धोखाहै ॥ २ ॥
तैं मैं काह करै नर बौरे क्या तेरा क्या मेरा ।
राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहु धौं काहि निबेरा ३
औ जो तैं मैं कहौहौ कि, तैं मैं आहो, मैं तैं आहो एकही ब्रह्मतौ है तैं
मैं कहा करैहै । बिचारिदेखु तौ क्या तेराहै क्या मेराहै सब साहबका तौ