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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 342

( २९२ ) बीजक कबीरदास ।
बूझहु पंडित करहु विचारी पुरुष अहै की नारी ॥ १ ॥
ब्राह्मण केरे ब्राह्मणी होती योगीके वर चेली ।
कलिमा पढ़ि पढ़ि भई तुरकिनी कलि में रहै अकेली ॥२॥
सो हे पंडित! तुम बूझौ औ विचारिकै काम करौ यहमाया पुरुषरूपहै कि
नारीरूपहै? यहमाया सबको लपेटि लियो है ॥ १ ॥ विद्या माया ब्राह्मणके तौ
ब्राह्मणी ह्वैकै बैठी है । ब्राह्मणकहैं हैं कि, हम ब्रह्मको जानै हैं ॥ "ब्रह्मजा-
नाति ब्राह्मणः" ॥ अरु घरमें ब्राह्मणी बैठायेरहै हैं, वाको स्त्रीको भाव करै हैं
बेटीसों बेटीको भाव, बहिनीसों भगिनीको भाव मानै हैं । सो कहो तो ब्रह्मभाव
कबभयो जो कहो जिनके स्त्री नहीं है तिनको तो ब्रह्मभाव ठीकहै तौ उनके
ब्रह्म जानपनीरूप ब्राह्मणीकी गरुरी बनी है । संयोगिनके तौ चेली ह्वै बैठी है
औ योगिनके योगिरूप ह्वै बैठी है। योगी महामुद्रा साधन करिकै वीर्यकी उलटी
गति कैदेइहैं । सो जब वृद्ध भये तब षोडशी कन्या एक घरमें रातिभरि राखिकै
संभोग करिकै उनको वीर्य लिंग द्वारते खैंचिकै कपारमें चढ़ाइ लेइहैं, तब आप
तरुणह्वै जाइहैं वह षोडशीकन्या मरिजाईहै। एतो बड़ो अनर्थकरै हैं। जे प्राणायाम
करिकै प्राणचढ़ाइ लै जाइहैं तिनके कुंडलिनी ह्वै बैठी हैं। औ मुसलमाननके जब
विवाह होइहै तब निगाह सों निकाह कै कलिमापढिकै तुरकिनी होइहै औ
मुसलमान होइहै । सो ये उपलक्षणहैं अर्थात् ब्राह्मणमें स्त्रीके साथ कर्मरूप
ह्वैकै औ योगिनके दशमुद्रा रूपह्वैकै औ मुसलमाननमें निकाह कलमा आदिकै
शरा अरूप ह्वैकै अकेली मायाही रहतभई साहबके काम ये एको नहीं हैं॥२॥
बर नहिं वरै ब्याह नहिं करई पुत्र जन्म होनि हारी ।
कारे मूड़े यक नहिं छाँड़े अवहूँ आदि कुवारी ॥ ३ ॥
वर कहे श्रेष्ठ जे हैं साहबके जाननवारे भक्त तिनको नहीं वरयो अर्थात्
उनको स्पर्श विद्या अविद्या ये दोनोंको नहीं है । अरु खसम ब्रह्म है सो व्याह
नहीं करैहै काहेते कि, धोखाकी भँवरी नहीं परै । औ मायाको पुत्र जगत् है
जाको गर्भ धारण करैरहै सो कारे कहे जिन के शिखाहै " हिंदू लोग " औ