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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

शब्द । ( ३०७ )
अथ तिरपन्वां शब्द ॥ ५३ ॥
गुरुमुख ।
वह विरवा चीन्है जो कोई। जरा मरण रहितै तन होई॥१॥
विरवा एक सकल संसारा। पेड़ एक फूटल तिनडारा ॥२॥
मध्यकेडार चारि फल लागा। शाखा पत्र गनतको बागा॥३॥
वेलि एक त्रिभुवन लपटानी। वांधेते छूटिहि नहिं प्रानी॥४॥
कह कबीर हम जात पुकारा। पण्डित होय सो करै विचारा ५
वह विरवा चीन्है जो कोई। जरा मरण रहितै तन होई॥१॥
जो बिरवाको आगे वर्णनकरै हैं ताको जो कोई चीन्है औ असार मानि
लेइ औ सार जो साहबहैं तिनको जानै सोपार्षद स्वरूप ह्वैजाइ औ जन्म मर-
णते रहित ह्वैजाइ ॥ १ ॥
बिरवा एक सकल संसारा । पेड़ एक फूटल तिन डारा ॥२॥
मध्यके डार चारि फल लागा। शाखा पत्र गनत को बागा॥३॥
सो एक बिरवा सब संसार है तौने बिरवाको पेड़ कहे मूल विराट् पुरुष है
तौनेमें ब्रह्मा विष्णु महेश तीनिडार फूट्यो है ॥ २ ॥ सो मध्यकी डार जे
विष्णुहैं तिनमें अर्थ धर्म काम मोक्ष येचारि फल लागत भये चारि फलके देवै-
या विष्णुह । सो जो कोई विष्णुका उपासक होइ सो चारों फलको पावै है ।
डारन जो डौरया कहै हैं ते शाखा कहावै हैं । सो ब्रह्मा विष्णु महेश जे तीनि
डौरै हैं तिनते नाना देव नाना मत भये। तेई शाखा हैं। तिनको को गनत बा-
गहै अर्थात् उनको अन्त कोई नहीं पायो औ सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी जे
नाना वासना होतभई तेई पत्र हैं ॥ ३ ॥
वेलि एक त्रिभुवन लपटानी। बाँधे ते छूटिहि नहिं प्रानी॥४॥
कह कबीर हम जात पुकारा। पंडित होय सो करै विचारा ५॥