कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २९७ )
ते सब सरिकै माटी ह्वै रहेहैं तेहिते माटी मासी है कहे मांसमें मिलिरही है औ
माटी मासी कहे मधुकैटभके मांसकी आई ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ घरियार बियाने रुधिर नीर जल भरिया ।
नदिया नीर नरक वहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥३॥
हाड झरी झरि गूद गली गलि दूध कहांतै आवै ।
सो तुम पांडे जेवन बैठे मंटिअहि छूति लगावै ॥ ४ ॥
अरु नदियाके जलमें मत्स्य कच्छ घरियार बियाने कहे होयहैं औ रुधिर
नीर मल इत्यादिक वही नदियाके जलमें मिलिजाइ है औ पशु मानुष सँरिजा-
यहैं; ते वही पानी पियोहौ औ आचार करोहो ॥ ३ ॥ दूधो हाड़ते झरि झरि
गूदते गलिगलिकै लोहू भयो वही लोहूते दूध भयो ताहीको लैकै हे पंडित! तुम
जेवन बैठौहौ औ माटी जो मांसहै ताको छूति लगावो हौ कि,मांसबड़ो अपवित्र
है याको जे खाइहैं ते बड़ो निषिद्धकर्म करै हैं सो कहो तो वह दूध मांसते
कैसे भिन्नहै ॥ ४ ॥
वेद किताब छोडि दिहु पांडे ई सब मनके कर्मा ।
कहैं कबीर सुनोहो पांडे ई सब तुम्हरे धर्मा ॥ ५ ॥
सो हे पांडे! शुद्ध अशुद्ध तो वेद किताबते जानेजाइहैं ते वेद किताबकों तुम
छोड़िदियो ये जे सब कहिआये जे तुम धर्म करौहौ ते तौ सब तुम्हारे मनके
कर्म हैं आपने मनहींते ये सब तुम बनाइ लियोहै इनते तुम न निबहौगे। श्रीकबी-
रजी काकु करैहैं कि हेपांडे! बिचारिकै देखौ ये सब तुम्हारे धर्म हैं? अर्थात् नहींहै
तुम तौ साहबकेहौ । अथवा कबीरजी कहै हैं एते सब कर्म करौहौ अपने मनके
बनाये औ वेद किताबौके कहेते ये सब तुम्हारे धर्मकहे तुम्हार शरीरमा हैं ।
तेहिते शरीरते भिन्न ह्वैकै आपने स्वरूपको जानौगे तब आपने सांचे कर्मनको
जानौगे यह व्यंग्यहै ॥ ५ ॥
इति सैंतालीसवां शब्द समाप्त ।
१ कहीं कहीं मट्टी मांसको भी कहैहैं परन्तु यहां तो मिट्टीसे आशय है मनुष्य
शरीरते क्योंकि, दम्भ करिके आपजी चहे कर्म करतेहै लोरे दूसरे पवित्र मनुष्यनते
छूत मानतैहै ।