कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३०६ )
तब छेरी जो है माया सो बीगा जो है जीव ताको खाइ लियो जीवको बीगा काहेतें
कह्यो कि, जो जीव अपने स्वरूप को जाने तौ छेरी जो है माया ताको नाशकै देइ
सो छेरी मायही बीगा जीवको आपने पेटमें डारिलियो । अरु छेरी मायाको
कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “अजामेकांलोहितशुक्लकृष्णां” इत्यादि । सो लोक
मकाश जो उदधि तहांतें निकरिकै चौड़ी छांछरी जो संसार तामें मच्छरूप
जीव घर मायाते बनवायो अर्थात् संसारी है गयो ॥ २ ॥
मेढुक सर्प रहै इक संगै बिल्ली श्वान बियाही ।
नित उठि सिंह सियारसों जूझै अदभुत कथो न जाही ३॥
वह कैसो संसारहै जहां मेढुक ( जीव ) औ सर्प ( काल ) एकैसंगरहै हैं ।
नाना शरीरंनको काल खात जाइहै पुनि पुनि शरीर होत जाइहै । अरु बिल्ली
जो है मानसी वृत्ति सो श्वान स्वानुभवानन्द ताको बिवाहीगई अर्थात् वाही
में लगिगई । वृत्तिकोबिल्ली काहेते कह्यो कि, बिल्ली जहां गोरस देखै है तहँ
जाइहै औ यह वृत्ति जो है सोऊ जहै रस जो है सुख सो देखैहै तहँ जाइहै ।
सो स्वानुभवानन्दमें बहुत सुख देख्यो याते वाहीको बिवाहीगई । तब नित-
उठिकै सिंह जो ज्ञान सो सियार अज्ञानते मारो जाइहै । जो कहो ज्ञान तो
अज्ञानको नाश करनवारो है अज्ञानते ज्ञान कैसे नाश होइहै ? सो वह जो
ब्रह्मज्ञान कियो कि, हम ब्रह्म हैं सो अद्भुत है कहिबेलायक नहीं है नेति कहैह
अर्थात् कोई जीव ब्रह्म नहीं भयो यह कौनेहू शास्त्र पुराणमें नहीं कह्यो कि,
फलानो जीव ब्रह्म है गयो याही ते मूलाज्ञानमें ठहराये हैं ॥ ३ ॥
संशय मिरगा तन बन घेरे पारथ बाना मेलै ।
सायर जरै सकल वन डाहै मच्छ अहेरा खेलै ॥ ४ ॥
येई दुइतुक अधिकसे जानेपरैहैं परन्तु पोथीमें लिखो लख्यो अर्थ करिदयो
सो शरीरबनको संशय जो मिरगा है सो घेरे है औ पारथ जे हैं गुरुवा लोग
ते संशयरूपी मृगाके मारिबेको बाण जो है नानाप्रकारको उपदेशरूप बाणी
ताको मेलैहैं सो उनको बाणीन ते संशय तो नहीं दूरि होइहै । संशय कहा
है सो कहै हैं सायर जो है बिबेकसागर सो जरिजाइ है औ नाना शरीर जे