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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 345

शब्द । ( २९५ )
लै आवै हैं तौने मुर्दाको रसोईमें सिझवै हैं ॥ १ ॥ औ नौ गुणको जनेऊ
कांधे में डारिकै स्नान करिकै बड़ो बेदना ऐसो तिलक दै कै बैठै हैं । सो कबीरजी
कूटकरै हैं कि, अब षट्कर्म बनि परचो कि, हांडीमें हाड़ है थारीमें हाड़है
मुखमें हाड़ है । व षट् कर्म ब्राह्मणके ये हैं । पढ़े पढ़ावै दान देइ लेइ यज्ञ
करै यज्ञ करावै । इहां ये षट्कर्म करै हैं एक हँड़िया दूजे हाड़ तीजे थारी
चौथे हाड़ पांचौ मुख छठों हाड़ अब ये अब षट्कर्म बनि परचो ॥ २ ॥
धरम कथै जहँ जीव बधै तहँ अकरम कर मेरे भाई ।
जो तोहरेको ब्राह्मण कहिये तौ केहि कहिय कसाई ॥ ३ ॥
कह कबीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनिआई ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४ ॥
जहां धर्मको कथैहै कि, या यज्ञहै, देवपूजन पितर श्राद्धहै याधर्म है तहँ
जीवनको मारै है । सो हे भाइउ ! जो करिबेलायक कर्म नहीं है सोऊ करैहैं
ऐसे जे तुम्हारे कर्म हैं तिनको, तो ब्राह्मण कहेंगे ब्रह्मके जनैया कहेंगे तो
कसाई काको कहेंगे ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं कि, ऐसे भ्रममें दुनियाँ भूलि
रही है । अपरमकहे परम नहीं ऐसी जो माया है ताते परब्रह्म है ताहूते पार
पुरुष समष्टि जीव हैं जाके अनुभवते ब्रह्म भयो है ताहूते उत्तम श्रीरामचन्द्र हैं
काहेते कि, वे विभु सर्वज्ञ हैं औ जीव अणु अल्पज्ञहै । ते श्रीरामचन्द्रकी जो
यहगति है ज्ञान सो कोई बिरलै पाई है अर्थात् कोई बिरला जान्यौ है कि,
सबते पर साहबई है । उनते सम औ अधिक कोई नहीं है । तामेंप्रमाण ॥
“सकारणकारणकारणाधिपोनचास्यकश्चिज्जनितानचाधिपः । नतस्य कार्यंकर-
णंचविद्यतेनतत्समश्चाभ्यधिकश्चदृश्यते ॥ इतिश्वेताश्वतरोपनिषदि ॥ समोन-
विद्यतेतस्यविशिष्टः कुतएवतु ॥ इति वाल्मीकीये । ” औकबीरौजीकोप्रमाण ॥
“साहब कहिये एकको दूजा कहो न जाइ । दूजा साहब जो कहैं, बाद
बिडंबन आइ ॥ जनन मरणते रहितहै, मेरा साहब सोय । मैं बलिहारी पीउकी,
जिन सिरजा सब कोय ॥ ४ ॥
इति छियालीसवां शब्द समाप्त ।