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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

( २९६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सैंतालीसवां शब्द ॥ ४७ ॥
पंडित बूझि पियो तुम पानी ।
जा माटीके घरमें बैठे तामें सृष्टि समानी ॥ १ ॥
छपन कोटि यादव जहँ विनशे मुनि जन सहस अठासी ।
परग परग पैगम्बर गाड़े ते संरि माटी मासी ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया ।
नदिया नीर नरक वहि आवै पशु मानुष सब सरिया॥३॥
हाड़ झरी झरि गूद गली गलि दूध कहांते आवै ।
सो तुम पाँड़े जेंवन बैठे मटिअहि छूति लगावै ॥ ४ ॥
वेद किताव छोड़ि दिहु पांड़े ई सब मनके कर्मा ।
कहै कबीर सुनोहो पांड़े ई सब तुम्हरे धर्मा ॥ ५ ॥
जे दंभ करिकै बड़ो आचार करैहैं जिनको चिद्अचिद् साहब को रूप है
यहबुद्धि नहीं है ताको कहै हैं ।
पण्डित बूझि पियो तुम पानी ।
जा माटीके घरमें बैठे तामें सृष्टि समानी ॥ १ ॥
छपन कोटि यादव जहँ विनशे मुनि जन सहस अठासी।
परग परग पैगम्बर गाड़े ते सरिमाटी मासी ॥ २ ॥
सो हे पंडित! ज्ञानतो तिहारे है नहीं आचारकरौ हो सो तुम कहांको पानी
पियौ हौ। भला बूझिकै कहे बिचारिकै तौ पानी पियौ। जौने माटीके घरमें अर्थात्
पृथ्वीमें तुम बैठेहौ तौनमें सब सृष्टि समाइरहीहै ॥ १ ॥ औ जौनी पृथ्वीमें
छप्पन कोटि यादव औ अठासी हजार मुनि ये उपलक्षण हैं अर्थात सबजीवन-
के शरीर वही माटी में मिलि मिलिकै सारिगये अरु परग परगमें पैगम्बर गाड़ेहैं