कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished766 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 340( २९० ) बीजक कबीरदास ।
( २९० ) बीजक कबीरदास ।
कर्म स्वभाव उनको अचित शरीरहै तेहिते बिना गोपाल कहूं ठौर नहीं है। जीव
नरक स्वर्ग जायहै सो अब बतावैहैं ॥ २ ॥
अन जानेको नरक स्वर्ग है हरिजानेको नाहीं ।
जेहि डरको सब लोग डरत हैं सो डर हमरे नाहीं॥३॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि अनजानेको नरक स्वर्ग है कहेनो कोई हरिको नहीं
जानैहै ताको स्वर्गहै और नरकहै । और जो कोई हरिको सर्वत्र जानैहै ताको न
नरकहै न स्वर्ग है । जौन डरको सब लोग डरायहैं माया ब्रह्म नरक स्वर्गादि-
कनको तौन डर उनको नहीं है काहेते वे तो सर्वत्र साहबैको देखैहैं ॥ ३ ॥
पाप पुण्यकी शंका नाहीं स्वर्ग नरक नहिं जाहीं ।
कहै कबीर सुनो हो संतो जहाँ पद तहां समाहीं ॥ ४ ॥
औ न उनको पापपुण्य की शंका है काहेते कि, जो कोई बद्ध होइ सो
मुक्त होइ, तेहिते न वे बद्धही हैं न मुक्तही हैं तामें प्रमाण श्रीभागवते॥"बद्धो-
मुक्तइतिव्याख्या गुणतोमेनवस्तुतः । गुणस्यमायामूलत्वान्नमेमोक्षोनबंधनम्” ॥
हम तो सर्वत्र साहबहीको देखैहैं वे नरक स्वर्गको नहीं जाइहैं सो कबीर जी
कहैहैं कि हे संतो! सुनो ऐसी भावना जे नर करैं हैं ते नर जहां पद तहां समाहीं
कहे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके अंश हैं सो तिनहीं के स्थानमें जाइ हैं ॥ ४ ॥
इति बयालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ तेतालीसवाँ शब्द ॥ ४३ ॥
पंडित मिथ्या करौ विचारा। ना हां सृष्टि न सिरजनहारा १
थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि धरणि न नीरा ।
ज्योति स्वरूपी काल न उहँवां वचन न आहि शरीरा॥२॥
कर्म धर्म कछुवो नहिं उहँवां ना कछु मंत्र न पूजा ।
संयम सहित भाव नहिं एकौ सोतो एक न दूजा ॥ ३ ॥