कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२७६) बीजक कबीरदास ।
अथ चौंतीसवां शब्द ॥ ३४ ॥
हरिजन हंस दशा लिये डोलैं।निर्मल नाम चुनी चुनि बोलैं १
मुक्ताहल लिये चोंच लोभावै।मौन रहै की हरि गुण गावै॥२॥
मान सरोवर तटके वासी।राम चरण चित अंत उदासी ॥३॥
काग कुबुद्धि निकट नहिं आवै।प्रति दिन हंसा दर्शन पावै४॥
नीर क्षीरको करै निवेश।कह कबीर सोई जन मेरा ॥ ५ ॥
जे साहबको नहीं जाने हैं तिनको कहिआये अब जे साहबको जानै तिनकी
दशा कहैं ॥
हरि जन हंस दशा लिये डोलैं।निर्मल नाम चुनीचुनी बोलैं १
हरिजे.परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं तिनके जे जन हैं ते हंस दशा जो है
शुद्धजीव पार्षद रूपता तौनी दशाको लिये सर्वत्र डोलै हैं कहे फिरै हैं । यहां
हरि जो कह्यो ताको हेतु यह है कि, अपने भक्तनकी सिगरी बाधाहरै सोहरि
कहावै है । सो परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र उनकी सिगरी बाधा हरिलेइहैं तब
तिनके जन सुख पूर्वक संसारमें फिरै हैं, उनको संसार स्पर्श नहीं करै है ।
अरु जो नाम माया सवलित है तिनको छोड़िदेइहै औ निर्मल जो नाम राम
नामहै मन बचनके परे अमायिक ताको चुनिचुनि कहे साहब मुख अर्थ ग्रहण
करिके औ संसारमुख अर्थ छोड़िके बोलै है कहेरामनाम उच्चारण करै हैं । यहां
मनबचनके परे जो नाम है ताको कैसे बोलै है ऐसो जो कहो तो ये हंस दशा-
लिये डोलै है कहे जब शुद्ध जीव रहिजाय है तब साहब अपनी इन्द्रिय देइहैं
तिनते तौने नामको बोले है। जैसे सूमा जरिजायहै तब वाकी ऐंठनभर रहिजा-
इहै । तैसे यहशरीरकी आकृतिमात्र रहि जाइहै वह पार्षदही शरीरमें स्थितरहैहै
जब शुद्ध शरीर है जाइहै तब आपनो पार्षदरूप पावैहै यह आगे लिखि आये हैं॥ १॥
मुक्ताहललिये चोंचलोभावै । मौनरहै की हरिगुणगावै॥२॥
हंस मुक्ताहल चोंच में लिये बचनको लोभावै है जौन मांगै है ताके मुंहमें
डारिदेइहै । ऐसे साधुन्के मुखमें पांचमुक्तिहैं १ सामीप्य २ सारूप्य ३