कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८२ ) बीजक कबीरदास ।
कायाकें बीर जीवहैं ते हरि जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्रहैं सबके कलेश हरनवारें
तिनको ठग जे गुरुवालोग हैं तिनके ठगतमें कहे रक्षकको छपायदेतमें जीवडरै
है कि, हमारी रक्षा अब कौन करैगो, वह ब्रह्म तो धोखई है वा तो गुरुबनहीं-
की रक्षा नहीं कियो औ तेई मालिक होतो तौ मायाके बश कैसे होते औ यम
कैसे धरि लैजाते ॥ ४ ॥
इति सैंतीसवां शब्द समाप्त ।
अथ अड़तीसवां शब्द ॥ ३८ ॥
हरि बिनु भर्म बिगुर बिन गन्दा ।
जहँ जहँ गये अपन पौ खोये तेहि फन्दे बहु फंदा॥१॥
योगी कहै योग है नीको द्वितीया और न भाई ।
चुण्डित मुण्डित मौन जटा धरि तिनहुं कहां सिधिपाई२
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ये जो कहहिं बड़ हमहीं।
जहँसे उपजे तहँहि समाने छूटिगये सब तवहीं ॥ ३ ॥
बायें दहिने तजो विकारै निजुकै हरि पद गहिया ।
कह कबीर गूंगे गुर खाया पूंछे सों का कहिया ॥ ४ ॥
या पदमें जें जीवनको गुरुवा लोगनको उपदेश लग्यो है तिन को कहै हैं
औ गुरुवा लोगनको कहैं ॥
हरि बिनु भर्म विगुर बिन गंदा ।
जहँ जहँ गये अपन पौ खोये तेहि फंदे बहु फंदा ॥ १ ॥
मलिन बुद्धि जाकी होइ है ताको गंदा कहै हैं सो गंदा जो यह जीवहै सो
बिना जाने भर्मते बिगारि जात भयो ताते चिन्मात्र हरि को अंशजो यहजीव
ताकी नीचं बुद्धि होइगई । जहांगयो तहां तहां अपनपौ कहे मैं सांचे साह-
बको हौं यहज्ञान खोयकै तौने फन्दामें परिकै तौने मतमें लगिकै बहुत फन्द
जे चौरासी लाख योनिहैं तिनमें भटकत भये ॥ १ ॥