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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

( २८८ ) बीजक कबीरदास ।
और जहां जहांकी बासना करिकै मरै है तौनी तौनी योनिमें प्राप्त होइ है एकै
जीव बासनन करिकै सर्वत्र होइहैं यह छूति कहांते उपजै है ॥ २ ॥
लख चौरासी बहुत वासना सो सब सरिभो माटी ।
एकै पाट सकल बैठारे सींचिलेत धौं काटी ॥ ३ ॥
यह जीव बहुत बासननमें परिकै चौरासी लाख योनिमें भटकैहै शरीर स-
रिकै माटी है जायहै एकै पाटमें कहै जगत्‌में नानां वासना करिकै
माया सबको बैठावतभई कहे शरीरधारी सबको करतभई अरु ये शरीर सब-
माटीही आई औ माटीमें मिलि जाइँगे औ जीव सबके एकही हैं औ एकही
पाटमें बैठे हैं सो वे जलको सींचिकै छूति काटि लेत हैं का जल सींचे छूति
मिटि जातहै ? नहीं मिटै ॥ ३ ॥
छूतिहि जेंवन छूतिहिअचवन छूतिहि जग उपजाया ।
कह कबीर ते छूति विवर्जित जाके संग न माया ॥ ४ ॥
सो वही छूति जो है बासना सो जब उठी तब जेंवन कियो औ वही वासना
उठी तब अँचयो । और कहांलौं कहैं वही बासना ते जगत् उपज्यो है । सो
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, जाके संग माया नहीं है सोई वासनारूपी छूतिके
विवर्जितहै । सो हे पंडित ! माया को जो तुम छोड़यो नहीं छूति तिहारे
भीतर घुसी है ऊपर के छूति माने कहा होइ बड़ी छूतिकियो है बासनैते
चित्तकी वृत्ति उठै है तब यह मानै है कि, हम ब्राह्मणहैं क्षत्री हैं वैश्य
हैं शूद्रहैं ॥ ४ ॥
इति इकतालीसवां शब्द समाप्त ।