सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 339

शब्द । ( २८९ )
अथ बयालीसवां शब्द ॥ ४२ ॥
पंडित शोधि कहहु समुझाई जाते आवागमन नशाई ॥
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौनदिशा वसभाई ॥ १ ॥
उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम स्वर्ग पतालके माहे ।
बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूं नरक जात धौं काहे ॥ २ ॥
अन जानेको नरक स्वर्ग है हरि जानेको नाहीं ।
जेहि डरको सब लोग डरतहैं सो डर हमारे नाहीं ॥ ३ ॥
पाप पुण्य की शंका नाहीं स्वर्ग नरक नहिं जाहीं ।
कहै कबीर सुनो हो संतो जहाँ पद तहां समाहीं ॥ ४ ॥
वासना मायाके योगते होइहै सो माया जौनी प्रकारते छूटै है सो
उपाय कहै हैं अरु आचारको वहां खंडन करिआये सो अब जौनी दशामें अचार
नहीं है सो कहै हैं ॥
पण्डित शोधि कहहु समुझाई। जाते आवा गमन नशाई॥
अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई ॥१॥
उत्तर दक्षिण पूरव पश्चिम स्वर्ग पतालके माहे ।
बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूं नरक जात धौं काहे ॥ २ ॥
हे पंडित! तुम तो सारासारको बिचार करौहौ सो तुम शोधिकै मोसों समुझाय
कहो जाते यह जीवात्माको आवागमन नशाइ । अर्थ धर्म काम मोक्ष ये फल
कौनी दिशामें रहै हैं? ॥ १ ॥ उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम स्वर्ग पाताल यहां
सर्वत्र मैं ढूंढ़ि डार्यों परन्तु विना गोपाल कहूं ठौर न देख्यों गोपाल कहे गों
जो इन्द्रिय जड़ मनादिक तिनके चैतन्य करनवारे जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहे
तिनहींको सर्वत्र देखत भयो । विषय इन्द्रियनते देवता मनते मन जीवते जीव
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रते चैतन्यहै सो जीव उनको चित्त शरीर अरु मायाकाल
१९