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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

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( २७२ ) बीजक कबीरदास ।
शरीरमें शिकारखेलैहै । पारथ कहे शिकारी जो तैं सो बोटालइहै अर्थात् नाना
उपासना नानाज्ञान करत फिरै है पै मन तोको नहीं छोड़ै है । साउज ते नहीं
बचैहै। वाणी रूप जो है पानी नानाशास्त्र तौनेमें( भूभुरि जोसूर्य्यनके तापते तपेत
भूमि होयहै सोभूभुरि कहावै है; ऐसे संसार तापते तपितजो)तेरा अंतःकरण सो
तलफिगयो अर्थात् अधिकअधिक शङ्का होतभई तिनते अधिकतप्त भयो शीतल न
भयो काहेते कि, धूरि जो सूखा ब्रह्मज्ञान सो हिलोरा देनलग्यो कहेशारूत्रनमें वही
धोखा ब्रह्मही देखपरन लग्यो । शास्त्रनको तात्पर्य्य साहब तिनको न जान्यो॥२॥
धरती बर्षै बादल भीजै भीट भया पैराऊ ।
हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ ३ ॥
बुद्धिजोहै सो धरती है काहेते सब मतनको आधारयहीहै बाणीरूप पानी
बरसै है कहे नानामटनको निश्चय कैकै प्रकट करै है । अरु यह बाणी
जीवनही ते प्रथम निकसी है सो जीव बादल है सो भीजै कहे वोई मतनको
ग्रहणकियो । यह लोकोक्तिहै किं, फलाने फलानेमें भीजिरहे हैं कहे आसक्त
द्वैरहे हैं। भीट चारो वेदहैं मर्यादाते पैराउह्वैगये कहे उनकी थाह कोई न
पावतभयो अर्थात् तात्पर्य्य कारिकै जोपरमपुरुष श्रीरामचन्द्रको वर्णनकरेहै सोकोई
न पावतभयो । ताल सूखे हंस उड़ैहै यहां हंसउड़े तालसूखे हैं जब हंस उड़ो कहैं
यहजीव निकसिगयो तबताल जोशरीरहै सोसूखि गयो । तब बासना जेहैं तेई
चहला हैं तिनमें पाँउ बँधिरह्यो । जैसे तलाउ जबसूखेउ औ पुनिचौमासेमें
जब जल बरसयो तब जस को तस द्वैगयो, तैसे बासनामें पाँउफँसिरह्योहै दूसर
शरीर जब पायो तब फिर वही शरीरमें तलाउमें हंसजीव बूडन उतरान
लग्यो है । सो भाव यह कि, उड़नको तो करै है पर शरीर तालते अंतै नहीं
जाइ सकैहै कोई योनियैमें रहै है ॥ ३ ॥
जौलखि करडोलै पगचलई तौलखि आश न कीजै ।
कह कबीर जेहि चलत न दीखै तासु वचन का लीजै॥४॥
जबलग पाँउ चलैहै करडोलै है कहे शरीर बनोहै तबलगि गुरुवालोगनकी
आश न करिये जो आश करोगे तो याहीभांति बँधि रहैगो । सो कबीरजी कहैं