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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 335

हे संतो भाई ! तुम सुनौ मनते भिन्नह्वैकै साहबके मिलबेकी जोहै संधि भेद
ताको कोई बिरला पायेहै अर्थात् जबभर मन बनोरहै है तबभर वाको भूलिवे-
की संधि बनीही रहै है, मनते भिन्न ह्वैकै वाके भजन करिवेको उपायकोई
बिरला जानैहै ॥ ४ ॥
इति उनतालीसवां शब्द समाप्त ।

अथ चालीसवां शब्द ॥ ४० ॥
पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
रामके कहे जगत गति पावै खांड़ कहे मुख मीठा॥१॥
पावक कहे पाव जो दाहै जल कहे तृषा बुझाई ।
भोजन कहे भूख जा भाजै तौ दुनियाँ तरिजाई ॥२॥
नरके संग सुवा हरि बोलै हरि प्रताप नहिं जानै ।
जो कबहूं उड़िजाय जँगलको तौ हरि सुरति न आनै ३
बिनु देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिये का होई ।
धनके कहे धनिक जो होतो निर्धन रहत न कोई ॥४॥
सांची प्रीति विषय मायासों हरि भगतनकी हांसी ।
कह कबीर यक राम भजे बिन वांधे यमपुर जासी॥५॥

पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
रामके कहे जगत गति पावै खांड़ कहे मुख मीठा॥१॥
सो हे पंडितौ जो बाद बदौहौ सो झूठाहै काहेते कि, पंडिततो वह कहावै
है जाके सारासार बिचारिणी बुद्धि होइहै सो सारासार बिचारिणी बुद्धि तों
तिहारे है नहीं पंडित भर कहावौहौ । काहेते कि, सारशब्दको झूठा कहौहौ
यह बाद बदिकै रामके कहेते जो गति पावतो तौ खांड़ाकेहे मुखमीठ हैजातो॥ १॥