कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 325, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २७५ )
तनमें लगाय देने भये । वेद किताबको तात्पर्य न जानतभये । सो कबीरजी
कहैंहैं कि, जौने जीवको मैं फंदते छोड़ायनहार मिल्योहों औ परमपुरुषमें लगाइ
दियो ते आजलौं नहीं विछुरे न बिछुरैंगा। सो तुम्हहूं पारिखकरिके मेरोकह्यो मानिकै
हे हंसजीवो! तुम्हहूं फंद छोड़ि परमपुरुष परजेश्रीरामचन्द्र हैं तिनमें लगौ ॥५॥
इति बत्तीसवां शब्द समाप्त ।
अथ तेंतीसवां शब्द ॥ ३३ ॥
हंसा प्यारे सरवर तेजे जाय ।
जेहि सरवर विच मोतिया चुनते बहु विधि केलि कराय १
सूखे ताल पुरइनि जल छोड़े कमल गयो कुंभिलाइ ।
कह कबीर जो अबकी विछुरै बहुरि मिलै कब आइ॥ २ ॥
हे प्यारे हंस ! सरवर जो शरीरहै ता तेजे जाय कहे जिनके शरीर छूटि-
जायहैं । जौने सरवर शरीरको प्राप्तहोइकै मोतिया चुनै हैं कहे ज्ञान योगादिक
साधन करिकै मुक्तिकी चाहकरै हैं औ बहु विधिकी केलि करै है । जो त्याजे
पाठहोय तौ या अर्थ है । हे हंसाजीव ! प्यारो जो सरवर शरीर ताकोत्यागे
जायहै जौन सरवर शरीरमें नाना देवतनकी उपासनारूप मोती चुने नाना
विषयनको भोग कीन्हे सो छोड़ेजायहै ॥ १ ॥ सोशरीररूपी ताल जब सूख्यो
कहे रोग करिके ग्रस्तभयो तब पुरइनि जल छोड़ि दियो अर्थात् वह ज्ञान
बुद्धि तुम्हारे न रहिगयो । अरु अनुभव तो तुमकरतहो सोई कमलहै सोकुं-
भिलाइगयो अर्थात् भूलिगयो सो कबीरजी कहैं कि, यहि तरहते जो अबकी
बिछुरै कहे शरीर छूटिजाय तब पुनि कबै ऐसो शरीर पावैगो । चौरासीलाख
योनि भटकेगो तब फेरि कबहूं जैसे तैसे मिलैगो शरीर छूटे ज्ञान योगादिक साधन
भूलिजाय हैं । तेहिते मानुष शरीर पायकै साहबको जानै । वह शरीरहू छूटे
नहीं भूलै है काहेते कि साहबही अपनो ज्ञान देइहै औ हंसस्वरूप देइहै ॥ २ ॥
इति तेंतीसवां शब्दसमाप्त ।