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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

हैं जे गुरुवा लोग नाना पदार्थनमें आश लगाइ देइहैं तिनहींते नहीं चलत
बनै है तौ तिनको कह्यो वचन कैसे कीजिये कहे कैसे मानिये ? अर्थात् उनके
यहां न जाइये काहेते कि, वे साहबको भुलाइकै और में लगाइ देंगे । संसार
ही में फँसो रहैगो यामें धुनि यहहै कि, जे संसारते छूटेहैं रामोपासकहैं तिनहीं
को बचन मानिये तिनहीं के यहां जाइये ॥ ४ ॥
इति इकतीसवां शब्द समाप्त ।

अथ बत्तीसवां शब्द ॥ ३२ ॥
हंसाहो ! चित चेतु सबेरा।इन्ह परपंच करल बहुतेरा ॥१॥
पाखंड रूप रच्यो इन्ह तिरगुण यहि पाखंड भूल संसारा ।
घरको खसम बधिक भो राजा परजा काधौं करै बिचारा॥२॥
भक्ति न जानै भक्त कहावै तजि अमृत विष कैलिय सारा।
आगे बड़े ऐसही भूले तिनहुं न मानल कहा हमारा ॥३॥
कहल हमार गांठी बांधो निशि वासर हि होहु हुशियारा ।
ये कलिके गुरु बड़ परपंची डारि ठगौरी सब जग मारा॥४॥
वेद किताव दोय फंद पसारा ते फंदे पर आप बिचारा ।
कह कबीर ते हंस न बिछुड़े जेहिमैं मिल्यो छोड़ावनहारा ५
हंसाहो चितचेतु सवेरा । इन्ह परपंच करल बहुतेरा ॥१॥
पाखंडरूप रच्यो इन्ह तिरगुण तेहि पाखंड भूल संसारा ।
घरको खसम बधिक भो राजा परजा काधौं करै बिचारा २
हे हंसा जीवौ ! सबेरेते कहे तबहीँते चित्तमें चेतकरौ । सबेरेते कह्योँ
ताको भाव यहहै कि, जब काल नियराइ आवैगो तब कछू न करत बनैगो
तिहारे फांसिबेको यह माया बहुत परपंच कियो है ॥ १ ॥ पहिले पाखंड-
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