कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८६ ) बीजक कबीरदास ।
पावक कहे पाव जो दाहै जल कहे तृषा बुझाई ।
भोजन कहे भूख जो भाजै तौ दुनियां तरिजाइ ॥ २ ॥
नरके संग सुवा हरि बोलै हरि प्रताप नहिं जानै ।
जो कबहूं उड़िजाय जंगलको तौ हरि सुरति न आनै ॥३॥
जो पावकके कहे दाह पावतो तो जीभ जरिजाती, औ जलके कहे तृषा
बुझाइ जाती, औ भोजनके कहेते भूख भाजिजाती तौ, रामके कहेते दुनियाँ
तरिजाती ॥ २ ॥ नरके पढ़ाये सुवा राम राम कहैहै औ श्रीरामचन्द्रको
प्रताप नहीं जानै है, काहेते कि, जब कबहूं जंगलमें उड़िजाय है तब रामकी
सुरति नहींकरै है । ऐसे जोतुम रामनाम कहि हरिको प्रताप जाना चाहोगे
तो कैसे जानौगे ॥ ३ ॥
बिन देखे बिनु अरस परस बिनु नाम लिये का होई ।
धनके कहे धनिक जो होतो निर्धन रहत न कोई ॥ ४ ॥
बिना देखे बिना स्पर्श किये नाम लिये कहा होइहै । अर्थात् जो कोई दूर-
होइ औ देखै न स्पर्श न होइ औ जो वाको नामलेइ तौ का जानि लेइहै ?
नहीं जानै है । धनके कहेते कोई धनिक ह्वैजातो तौ निर्धनी कोई न होतो
ऐसे नाम लिये जो मुक्ति होत तौ सब मुक्तै होइजात । सो हे पंडितौ तुम
ऐसे असंगत दृष्टांतदैके यहवाद बदौहौ सो झूठा है । काहेते कि, रामनाम तौ
मन बचनके परे है औ ये सब बचन में आवै हैं । औ वह राम नाम साहबके
दियेते स्फुरित होइहै । यहै रामनाम जपते औ ये सब अनित्य ह्वैजाइहैं ॥ ४ ॥
सांची प्रीति विषय मायासों हरिभक्तनकी हासी ।
कह कबीर यक राम भजे बिनु बांधे यमपुर जासी ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहैं हैं कि, हे नास्तिक पण्डितौ ! विषय मायासों सांचीप्री-
ति करौहौ औ ऐसे ऐसे कुबाद बदिकै हरिभक्तनकी हासी करौहौ; नाम रूप
लीला धामको खण्डन करिकै । सो एक जे परम पुरुष श्रीरामचन्द्र हैं तिनके
नामके बिना भजन किये बांधे मोगरन की मार सहत यमपुरहीको जाहुगे ।