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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 341

शब्द । ( २९१ )
गोरख राम एकौ नहिं उहँवां ना ह्वां भेद विचारा ।
हरि हर ब्रह्म नहीं शिव शक्ती तिरथौ नहीं अचारा ॥ ४ ॥
माय वाप गुरु जाके नाहीं सो दूजा कि अकेला ।
कह कबीर जो अबकी समझै सोई गुरू हम चेला ॥ ५ ॥
हे पंडित ! तुमतौ वहि ब्रह्मको मिथ्यै बिचार करोहो। जो यहिपदमें वर्णन
करिआये सो वहमें एकउ नहीं है वह तो धोखाही है सो कबीरजी कहै हैं कि,
जो सो वह आत्माते दूसर है कि अकेल वह ब्रह्महै? जो अबकी समझै कहे यह
ज्ञान भये पर समझै कि, मैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको हौं वह ब्रह्म धोखा है
सोई गुरुहै । म चेलाहौं काहेते कि, मोहिं तो धोखई नहीं भयो है जो आप-
नेको ब्रह्ममानिकै औ साहबको समझै है औ वाको धोखा मानिलेइ सो मेरो
गुरुहै औमैं वाको चेलाहौं अर्थात् सोई मोसों अधिक है काहेते कि, वह धोखा
में परिकै निकस्यो है यह प्रशंसा कियो ॥ ५ ॥
इति तेतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ चवालीसवां शब्द ॥ ४४ ॥
बूझहु पंडित करहु विचारी पुरुष अहै की नारी ॥ १ ॥
ब्राह्मणके घर ब्राह्मणी होती योगीके घर चेली ।
कलिमा पढ़ि पढ़ि भई तुरुकिती कलिमें रहै अकेली ॥२॥
वर नहिं वरै व्याह नहिं करई पुत्रजन्म होनिहारी ।
कारे मूँड़े यक नहिं छाँड़ै अवहूँ आदिकुवांरी ॥ ३ ॥
मायिक न रहै जाइ न ससुरे साई संग न सोवै ।
कह कबीर वे युगयुग जीवैं जाति पांति कुल खोवैं ॥४॥
यह मायाही सब जगतके जीवनको भरमायो है सोई कहैं ॥