कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अठहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मानुष मन्म चूकेजगमाझी । यहितनकेर बहुतहैं साझी ॥ १ ॥
तातजननिकहै हमरोवाला । स्वारथलागि कीन्हप्रतिपाला २
कामिनिकहै मोर पिय आही।वाघिनिरूप गरासै चाही॥ ३॥
पुत्र कलत्र रहैं लवलाये । जंबुक नाईं रह मुँहवाये ॥ ४ ॥
काकगीध दोउ मरण विचारैं। शूकरश्वान दोउ पंथनिहारैं ५
धरती कहै मोहिं मिलिजाई । पवन कहै मैं लेब उड़ाई ॥६॥
अग्नि कहै मैं ई तन जारौं।सो न कहै जो जरत उबारौं॥७॥
ज्यहि घर को घरकहै गवारे । सो बैरी है गले तुम्हारे ॥ ८ ॥
सो तन तुम आपनकैकजानी।विषयस्वरूप भुले अज्ञानी॥९॥
साखी ॥ यतने तनके साझिया, जन्मोभरि दुखपाय ॥
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ १० ॥
मानुष जन्म चुकेजगमाझी । यहितनकेरबहुतहसाझी ॥ १ ॥
तातजननिकहैहमरोवाला । स्वारथलागिकीन्हप्रतिपाला २
कामिनिकहैमोरपियआही। वाघिनिरूपगरासैचाही ॥ ३ ॥
हे जीव ! तैं मानुष जन्मजगतके बीच में पायक चूकिगयो साहब को भजन
न कियो या तनके साझिया बहुत हैं ॥ १ ॥ औमाता पिता कहैं हैं हमारों
पुत्रह आपने अर्थ में लगिकै प्रतिपालकरै है ॥ २ ॥ औ कामिनि जो परस्त्री
है सो कहै है हमारो बड़ो प्यारो पति है बाघिनिरूप रति समय में गरासि-
बोई चाहै है अथवा वाके संगते मूड़हू काटो जायहै ॥ ३ ॥