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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 240

( १९० ) बीजक कबीरदास ।
अथ दूसरा शब्द ॥ २ ॥
संतौ जागत नींद न कीजै ।
काल न खाय कल्प नाहिं ब्यापै देहजरानाहिं छीजै ॥ १ ॥
उलटी गङ्ग समुद्रहि सोखै शशि औ सूरगरासै ।
नवग्रह मारि रोगियाबैठे जलमें बिंब प्रकासै ॥ २ ॥
बिनुचरणन को दशदिशि धावै बिन लोचन जगसूझै ।
ससा सो उलटि सिंह को ग्रासै ई अचरज कोऊ बूझै ॥ ३ ॥
औंधे घड़ा नहीं जल डूबै सूधेसों घट भरिया ।
जेहिकारण नर भिन्न भिन्न करु गुरुप्रसादते तरिया ॥ ४ ॥
पैठि गुफामें सब जग देखै बाहर कछुव न सूझै ।
उलटाबाण पारथिव लागै शूराहोय सो बूझै ॥ ५ ॥
गायन कहै कबहुं नहिंगावै अनबोला नितगावै ।
नटवर बाजीपेखनी पेखै अनहदहेतु बढ़ावै ॥ ६ ॥
कथनी बदनी निजुकै जोहैं ईसब अकथकहानी ।
धरती उलटि अकासहि वेधै ई पुरुषहि की बानी ॥ ७ ॥
विना पियाला अमृतअचवै नदी नीरभरि राखै ।
कहै कबीर सो युग युगजीवै राम सुधारस चाखै ॥ ८ ॥
संतो जागत नींद न कीजै ।
काल न खाय कल्प नहिं ब्यापै देह जरानाहिंछीजै ॥ १ ॥
हे संतौ ! हे जीवौ ! तुमतो चैतन्यरूप हौ तुम काहेको सोवौहौ अर्थात्
काहे जड़ भ्रममें परेहो मायादिक तो जड़ हैं औ तिहारो अनुभव जो ब्रह्महै
सोऊ जड़ है । काहेते कि, तिहारो मन तो जड़है ताहीकी कल्पना ब्रह्महै ।