कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । (१९१)
जो कहो "मनको विषय ब्रह्म है" यह तो कोई वेदांतमें नहीं है तो जहां भर
मन वचनमें आवै तहांभर अज्ञान कल्पितहै। औ "अहंब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्महौं)
मानिबो तो मूलाज्ञानमें है । यह वेदांतको सिद्धांतहै जैसे, धूरि धूम बादर
घटादिकके आकाशही रहिजायहै। कबीरजी कहैंहैं कि, तैसे तीनों अवस्थामें
तुमहीं रहिजाउहौ। जहांभर ब्रह्म कहैंहैं औ विचारकरैंहैं सोमन वचनमें आइ-
जाइहै ताते, मनही को कल्पितहै; ताते वोज़ड़हैं, सो तुम नहींहौ। तुमतौ
चैतन्यहौ। तिहारेरूपको कालनहीं खाय है। औ कौनौ कल्पना नहीं व्यापै है
अर्थात् कौनौ तुम्हारे स्वरूप में कल्पना नहीं उठै है । औ तेरो जोस्वरूपहै
याते परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके समीप रहैहै। सो रूप जरा जो बुढ़ाई है ताते
नहीं छीनै है अर्थात् कबहूं बुढ़ाई नहीं होइहै सदा किशोर बनोरहै है ॥ १ ॥
उलटी गंग समुद्रहि सोखै शशि औ सूर गरासै ॥
नवग्रहमारि रोगिया बैठै जलमें बिम्ब प्रकासै ॥ २ ॥
रागरूपी जोहै गङ्गा सो संसारमुख ब्रह्ममुख ह्रैरहीहै। सो जो उलटै साह-
बमुख होइ साहबमें जीव अनुरागकरै तो समुद्रजोहै संसारसागर औधोखा
ब्रह्मसागर ये दुहुनको सोखिलेइ। औ शशि जो है जीवात्मा मानिबो कि एक
आत्मही है, दूसरो पदार्थ नहीं है यहज्ञान; औ सूर जो है नाना निरंजनादिक
ईश्वरनके दास मानिबेको ज्ञान; तौनेको गरांसिलेइहै । औ यहसांचो साहब
कोहै जान याको देइहैं संसारवालो जो रोगहै सो पारखहीते जायहै। सो नव-
ग्रह जब निबल होइहै तब रोगहोइहै। सो नवग्रह नवद्रव्यहैं। नवद्रव्यके
नाम १ पृथ्वी २ अप् ३ तेज ४ वायु ५ आकाश ६ काल ७ आत्मादिक
८ दिशा ९ मन तिनकोमारिकै कहे मिथ्या मानिकै औ अपनी आत्माको
साहब को दास मानिकैबैठे, तब रागरूपी जलमें बिंब जो है शुद्ध साहब को
अंश याको स्वरूप, जाको प्रतिबिंब धोखा ब्रह्महै औ संसारहै तौन प्रकाशै कहे
अपने स्वस्वरूपको जानै ॥ २ ॥
बिन चरणनको दशदिशि धावै बिन लोचन जग सूझै॥
ससा सो उलटि सिंहको ग्रासै ई अचरज कोऊ बूझै ॥३॥