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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

शब्द १ (१८९)
वृक्षमें लागतभये ते सब एकबाणी बोलै हैं कि, “एक ब्रह्मही है दूसरो नहीं है”
साहबको नहीं जानै है सो वहीमक्खी जो जीवहै ताकेमक्खा नहीं है कहेप्रथम
जीव जो हिरण्यगर्भ समष्टि जीवहै ताके पति नहीं है परन्तु बिना पानी गर्भर-
हतईभयो जीवते संसारमेंकटै यह आपहीते नामको जगत् मुख अर्थ करिकै
संसारी ह्वैगयो साहब तौ याको उद्धार करिबो रमानाम दियो ताकि मेरेनाम
मेरो अर्थ जानिकै मेरेपास आवै संसार न होइ ॥ ३ ॥
नारीसकल पुरुषहि खायी, ताते रही अकेला ।
कहै कबीर जौ अबकी समझै, सोइ गुरु हमें चेला ॥ ४ ॥
नारी जो है वहै कारणरूपा माया, सो सबजीव ईश्वर जेपुरुषहैं तिनको खाइ-
लियो, कहे आपने पेटमें डारिलियो; अर्थात् उन के काहूके ज्ञान न रहिगयो,
आपनोचेरो बनाइ लियो । तेहिते हे संतौ ! हे:जीवो ! तुमतो शुद्धहौ, इनको
छोड़िदेउ, तब साहब जे हैं ते