कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १८१ )
सुरपतिजाइअहल्याछलिया। सुरगुरुघरणिचंद्रमाहरिया ३
कहकवीरहरिके गुणगाया । कुंतीकर्णकुवारेहिजाया ॥४॥
सुरपतिअहल्याको गमनकरतभयो औ सुरगुरु जे बृहस्पति हैं तिनकी स्त्रीको
चन्द्रमा गमन करतभयो ॥ ३ ॥ औ कुन्ती जो हैं सो कुंवारेहिमां कर्णको
उत्पन्न कियो है सो कर्म तो या डौलके हैं जो नीचहू नहीं करै है परन्तु कबी-
रजी कहै हैं कि हरिके गुण गावतभये ताते इनहूकी सज्जनहीं में गिनती भई
ऐसहुमें हरिरक्षाकैलियो सो हे जीव ! तैं केता अपराध कियो ॥ ४ ॥
इति इक्यासिवीं रमैनी समाप्तं ।
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अथ बयासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
सुखकबृक्षयकजक्तउपाया । समुझिनपरीविषयकछुमाया १
छौक्षत्री पत्री युग चारी । फल द्वै पापपुण्य अधिकारी २
स्वादअनंतकछुवर्णिनजाहीं । कर चरित्र सो तेही माहीं ३
नटवरसाजसाजिया साजी । सो खेलै सो देखै बाजी ४
मोहा बपुरा युक्ति न देखा । शिवशक्तीबिरंचिनहिंपेखा ५
साखी ॥ परदेपरदे चलिगया, समुझि परी नहिं बानि ॥
जो जानै सो बाचिहै, होत सकल की हानि ॥६॥
सुखकबृक्षयकजक्तउपाया । समुझिनपरीविषयकछुमाया १
छौक्षत्रीपत्री युगचारी । फलद्वै पाप पुण्यअधिकारी ॥ २ ॥
स्वादअनन्तकछुवर्णिनजाही । करचरित्रसो तेहीमाही॥३॥
साहबको बिसरायकै सूखा जो बृक्षहै यह संसार माया कहे पावत भयो बिषय
बिषरूप माया न समुझिपरी संसारीह्वैगयो ॥ १ ॥ शरीर धारनकैट छा उरमिनको