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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

( १८४ ) बीजक कबीरदास ।
आपनेको और और देवताके दास मानै है यहनाममिटाइदेइऔ यह जीवका जीव
नाममिटाइदेइ औ हंसरूप में स्थितह्वैकै जीवको नाम रामदास धरावै तबहीं
यहजीवको प्रतिपाल होईहै आपने देखतै जन्म मरणको लैहे कहे छोड़िदेइ
है ॥४॥ सो जो कोई या भांति साधन करै सो हालै निशानेमें घाउकरै अर्थात्
मनोनाश बासक्षय हालै ह्वै जाइहै औ जेमनमतराउह अपने मनमतमें अपनेको
राजामानै हैं जूझिकै संसारमें परे अर्थात् कोई आपनेनको ब्रह्ममानै है कोई
आत्मैंको मालिकमानैहै ते जैसे मिथ्या वासुदेव अपनेको कृष्णमानि जूझिपरयो
ऐसे येऊ मनमाया करिकै मारे जाय हैं ॥ ५ ॥
साखी ॥ मनमतमरैनजीवई, जीवहिमरण न होय ॥
शून्यसनेहीरामविन, चलेअपनपौखोय ॥ ६ ॥
मनमती न मरै है न जियै है काहेते जीवहि मरण न होय जीवको जीवत्वनहीं
जाइ है जिअब तो तब कहिये जब साहबको जानिकै साहबके लोकहि में जन्म
मरण छूटि जाय मरिबो तब कहिये जब ब्रह्ममें लीनहोय जीवत्व छूटिजाइ
जनन मरण न होइ सो शून्य जे हैं वे धोखा तिनके सनेही जे मनमती हैं तेमरै
हैं न जिये हैं जीवको तत्त्व नहीं जाइ है जीव सनातनको है तामें प्रमाण ॥
( ममैवांशोजीवलोकेजीवभूतः सनातनः ) ॥ ६ ॥
इति तिरासिवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौरासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जोजिय अपनेदुखै सँभारू ।सोदुःखव्यापिरहोसंसारू॥१॥
माया मोह बंध सब लोई । अल्पै लाभ मूलगो खोई॥२॥
मोर तोर में सबै बिगूता । जननीउदर गर्भमहँसूता ॥ ३॥
ई बहुरूप खेलै बहु बूता । जनभौरा असगये बहूता ॥४॥
उपजैखपै योनिफिरि आवै।सुखक लेशसपनेहुंनाहिंपावै॥५॥