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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

रमैनी । ( १७७ )
पुत्र कलत्र रहें लवलाये । जम्बुकनाई रहमुहबाये ॥ ४ ॥
कागगीधदोउमरणविचारै । शूकरश्वानदोउपंथनिहारै ॥५॥
धरतीकहै मोहिंमिलि जाई। पवन कहै मैलेव उड़ाई ॥ ६ ॥
अगनिकहै मैं ई तन जारों । सोनकहै जोजरतउवारों ॥७॥
पुत्र कलत्र जो घरकी स्त्री को लालच लगाये रहे हैं धनलेवे की औ वाको
उनकी चिंता म मांससुखान जात है जैसे सियार मांस खावेको मुंहफारे रहे है
तैसे वोऊहैं ॥४॥ औकाग जेहैं गीधजे हैं शूकर जेहैं श्वान जेहैं ते मरनको पंथ
तेरो निहारै हैंया विचारै हैं कि जो मरै तौ हम मांसखायँ॥ ५॥औधरती कहै है
कि मोहिं में मिलिजाइ पवन कहै है कि याकी खाक मैं उड़ाय लैजाउँ॥ ६॥औ
अग्नि चाहै है कि याके तनको जारिडारों सो या बात कोई नहीं कहै है जाते
जरत में उबार होई बचिजाय ॥ ७ ॥
जेहिघरको घरकहै गवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ ८ ॥
सोतनतुमआपन कै जानी विषयस्वरूपभुलेअज्ञानी ॥६॥
साखी । यतने तनके साझिया, जन्मो भरिदुखपाय ॥
चेतत नाहीं बावरे मोर, मोर गोहराय ॥ १० ॥
जेहि घरको शरीरको तू कहै है कि मेरो है सोघरशरीर तेरेगले की बेरीकहै
फांसीहै अथवा बैरी है यमके यहां गलाकटावेंगे ॥८॥ हे अज्ञानी ! तौनेशरीरको
तू आपनो मानिकै विषयनमें परिकैभूलि गयो है ॥९॥ सो यतने जेतने कहिआयें
ते यहि तनके साझी हैं तिन तेजन्म भरि तैं दुःखपायकै हेबावरे ! कहे मूढ
मोरमोर तैं गोहरावै है कि यातनमेरो है अजहूं चेतनहीं करै है कि यातनैमोकां
फांसेहै ॥ १० ॥
इति अठहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
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