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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

रमैनी । ( १७५ )
तौलि जाइहै कि हलुकै गरुहै अर्थात् अहंब्रह्म मानिबो तो धोखाहै जो कछु-
होइ तोकहिजाइ औतोलि जाइ ॥३॥ जौनेलोकमें न भूखह न तृषाहै न धूपहै
न छांहीं है न दुःखहै न सुखहै तौने साहबके लोकमें प्रकाशरूप ब्रह्मरहैहै॥४॥
साखी ॥ अपरमपरअरूपमगुरंगी, नहिंतेहिसंख्याआहि ॥
कहहिंकबीर पुकारिकै, अद्भुत कहिये ताहि ॥५॥
वह साहबको लोक परमरूपहै ताको प्रकाश जो है वह ब्रह्म सो परमपुरुष
है कहे परम नहीं है तौनेको आपनेहीको मानिबो जो है कि वह ब्रह्महमीं हैं
सो धोखाहै तौनेके मगमरगे जीवहैं तिनकी संख्या नहीं है अर्थात् वही प्रका-
शमें भरेरहे जे समष्टि जीवह ते व्यष्टि ह्वैगये हैं तिनकी संख्या नहीं है सो
कबीर जी पुकारिकै कहै हैं कि आपही कल्पना करिकै वह प्रकाश रूप ब्रह्म
कोमान्यो कि वह ब्रह्ममैं हौं सो वह तो लोकप्रकाशहै हे जीव! वहप्रकाशब्रह्म नहीं
ह्वैसकैहै यही धोखाम जीव बूड़ो जाइ है यह बड़ो आश्चर्य हैं औ जोयह
पाठहोइ ॥ अपरमपारै परमगुरु ज्ञानरूप बहुआहि ॥ तौ यह अर्थ है अपरम
जोहै प्रकाशरूप ब्रह्म ताहू के पारजोहै परमलोक जाको प्रकाश वह ब्रह्महै
ताको परमश्रेष्ठकहेमालिक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको न जान्यो वहजो
है प्रकाशब्रह्म ताको जोज्ञान कियो कि ब्रह्ममहौं वहै जो है धोखा ब्रह्म तेहिते
बहुआहि कहे जीव बहुत ह्वैगये काहेते कि ज्ञानबहुतहै ज्ञानीज्ञान करिकै ब्रह्म
मानैं हैं औ योगी जेहैं ते ज्योतिरूप में आत्माको मिलाइकै ब्रह्म मानै हैं
इत्यादिक नानारूप करिकै ऐक्यमानै हैं औ और सगुण उपासनावारे कोई
चतुर्भुज कोई अष्टभुज कोई देबी कोई गणेश कोई सर्य इत्यादिकनमें ऐक्य-
मानैं हैं ज्ञानकरिकै तेहिते ज्ञाननाना हैं औ साहब तो मनबचनके परे वह लोक
में एकही बनो है ॥ ५ ॥
इति सतहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।