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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

( १९४ ) बीजक कबीरदास ।
स्थूल सूक्ष्मादिक जे पांचौं शरीरहैं तेई पियालाहैं । स्थूलसूक्ष्म कारण करिकै
विषयानंद पिये हैं । औ महाकारण कैवल्य ते ब्रह्मानंदपिये हैं । पांचौ शरीर
पियाला ते निकसिकै जे पुरुष साहबको दियो जो हंसस्वरूपहै तामें स्थित हैकै
साहबको प्रेमरूपी जो अमृतहै ताको अँचवै हैं जाते जन्म मरण न होई। तिन
को जगत्के रागरूपी नीरकारिकै भरी जो नदी है जाको आगे वर्णनकरिआयेहैं
"नदियानीर नरकभरि आई" सो तिनको राखै कहे छारई हैं अर्थात् झूरहीहैं ।
अथवा संसारमें जो रागकियेहैं सो नरक भरीहैं ताको निकारिकै रसरूपी भक्ति
जो साहबकी नीर ताको भरिराखै । सो कबीरजी कहै हैं कि, सोई युगयुग
जीवैहै, कहे वहीको जनन मरण नहीं होय, जो या भांति परमपुरुष जे श्रीराम-
चंद्रहैं तिनके प्रेमरूपी सुधारसको चाखैहै ॥ ८ ॥
इति दूसराशब्द समाप्त ।
अथ तीसरा शब्द ॥ ३ ॥
संतौ घरमें झगराभारी ।
रातिदिवस मिली उठिउठि लागैं पांचढोटायकनारी ॥१॥
न्यारोन्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी ।
कोइकाहूको हटा न मानै आपुहिआपुमुरादी ॥ २ ॥
दुर्मति केरदोहागिनी मेटै ढोटैचाप चपेरै ।
कहकवीरसोई जन मेरा घर की रारि निबेरै ॥ ३ ॥
सन्तोघरमें झगराभारी ।
रातिदिवसमिलि उठिउठिलागैं पांचढोटायकनारी ॥ १ ॥
आगे या कहिआयेहैं कि बिना पियाला अमृत अचवैहैं औ जे नहीं अचवैहैं
तिनको कहै हैं । हेसंतौ ! हे जीवौ ! या घर जो शरीरहै तामें भारी झगरा
मच्यो है । पांचौ ढोटा जे पांचौ तत्त्वहैं औ नारी जो मायाहै सोउठि उठिलागैहैं
कहे झगराकरैहैं । यहै उपाधिराति दिन जीवको लगिरहैहै ॥ १ ॥