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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 766 में से

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पृष्ठ 242

( १९२ ) बीजक कबीरदास ।
तब बिना चरणनको कहे संसारमुख चलिबो ब्रह्ममुखचलिबो याको छूटिगयो ।
अर्थात् येई चरणहैं तिनते हीन है गयो । तब नवधाभक्तिको छोड़िकै दश
कहे दशौ जो साहबकी “अनुरागात्मिका” भक्तिहैं तोनेके दिशःको धावै है ।
अथवा नवद्वारको छोड़िकै दशौ द्वारको जो है मकरतार साहब के इहांकी डोरी
लगी है तहांको धावै है । औ शरीरनको जे प्राकृत नयन हैं ते याके न रहि-
गये । साहब को दियो जो याको हंसस्वरूप है तौने के नेत्रकरिकै साहब को
चिद्दिद् रूप यह संसार सो सूझि परन लग्यो कहे बूझिपरनलग्यो । तब
अरेमूढ़ ! भ्रमरूपजो है ससा खरहा अहंब्रह्म विचार सो, तैं जो है समर्थ
सिंह ताको ग्रासै है । सो वहतो धोखाहै वही भर्म भूलि गयो । सो हेजीवो !
यह अचरज कोऊ बूझै । औ जोनज्ञान मैं कहि आयों तौनकरि साहबमें
लगो । जो कवहूं न होई नई बात होय सो यह आश्चर्य है । ससा सिंहकों
कबहूं नहीं खाइहै जीव ब्रह्म कबहूं नहीं होयहै सो तुम कबहूं ब्रह्म न होउगे ।
वह ब्रह्म तुम्हारई अनुभवहै ताहि में तुम भुलाने हौ ॥ ३ ॥
औंधे घड़ा नहीं जल भरिया सूधे सों घट भरिया ॥
जेहि कारण नर भिन्नभिन्न करु गुरुप्रसादते तरिया ॥ ४ ॥
औंधा घड़ा जो जल में डारि दीजै तौ नहीं डूबैहै, जलनहीं भरि आवैहै ।
सो तैं जो साहबको पीठिदै कै ब्रह्ममें औ संसार में लगै सो तौ धोखाहै। जैसे सूधे
घटमें जलभरि आवै है तैसे तैंहूं साहबकी ओर मुखकरु, जब साहब तेरेऊपर
प्रसन्नहोइगो तबहीं तैं ज्ञान भक्ति करिकै पूरा होइगो । जाकारण नर भिन्न
भिन्न करै है कहे भिन्न भिन्न पदार्थ मानै है औ सब पदार्थ साहबको चिदचिद् रूपक-
रिकै नहीं देखै हैं। सो यह भ्रम समुद्र गुरु सबते श्रेष्ठ अंधकारको दूरिकरनवारे
परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके प्रसादते तरोगे । अथवा साहबके बतावनवारे
अंधकारके दूरि करनवारे जब गुरुमिलैंगे तब तिनके प्रसादते तरोगे ॥ ४ ॥
पैठि गुफामों सब जग देखै बाहर कछुव न सूझै ॥
उलटा बाण पारथिव लागै शूर होय सो बूझै ॥ ५ ॥
दुर्लभ मनुष्य शरीररूपी जो गुफाहै तौनेमें पैठिकै कहेशरीर पाइकै चिदचिद