कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १८५ )
दुःख सँताप कष्ट बहुपावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ६
मोर तोर में जर जग सारा। धिग जीवन झूठो संसारा ॥७॥
झूठे मोह रहा जगलागी । इनते भागि बहुरि पुनि आगी ॥८॥
जेहित कै राखे सबलोई । सो सो सयान बाचे नहिं कोई ॥९॥
साखी ॥ आपु आपु चैते नहीं, औ कहौतौ रिसिहा होइ ॥
कहकवीरसपनेजगै, निरस्ति अस्ति नहिं कोइ ॥१०॥
जोजियअपनेदुखैसँभारू । सोदुखव्यापिरहोसंसारू ॥ १॥
मायामोह बंध सबलोई । अल्पै लाभ मूलगो खोई ॥ २ ॥
मोरतोरमें सबै विगूता । जननी उदर गभमहँसूता ॥ ३ ॥
ई बहुरूप खेलै बहु बूता । जनभौंराअसगये बहूता ॥ ४ ॥
हे जीव ! जौन दुःखयह संसारमें व्यापिरह्यो है तौने अपने दुःखकों सँभारु
अर्थात् तौने दुःखसे निकसु ॥ १ ॥ मायामोहमें सब बँधेहौ सो अल्पतो लाभ
है अर्थात् विषय सुखतो थोरही है तिन सबकेमूल संपूर्ण दुःख के मेटनवारे जे
परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते खोइनाइ हैं कहे बिसरि जाय हैं ॥ २ ॥ मोर
तोर याही में सब जीव विगूता कहे अरुझि रहे है याहीते जननीके उदरमें
सदा सूतत है अर्थात् गर्भवास नहीं मिटे है ॥ ३ ॥ जैसे भौंरा फूलनमें रस
लेनको जाइ है संध्या द्वै गई तब कमल संपुटित द्वैगयो तब फँसिगयो तैसे ये
जीव बहुरूपते बहुत पराक्रम करिकै खेलखेलै हैं कहे विषय रसलेनको जाय ही
मायामें फँसिजाय हैं ॥ ४ ॥
उपजैकपैयोनिफिरिआवै।सुखकलेशसपनेहुंनहिंपावै ॥५॥
दुःखसँतापकष्ट बहुपावै । सो न मिला जो जरतबुझावै॥६॥
उपजै है औ खपैकहे मरै है पुनि पुनि योनिमें फिरि आवै है सुखको लेश
सपन्यो नहीं पावै है ॥ ५ ॥ दुःख संताप कष्ट बहुतपावै है जो आगीते जरत