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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

रमैनी । ( १५१ )
परै जब न सूझि पर्यो तब अज्ञान द्वैगये नेतिनेति कहनलगे कि, अकथ है
कबीरजीका प्रमाण ॥ "वेदविचारि भेद जो जानै। सतगुरु मर्मशब्द पहिचानै"
॥ ४ ॥ गुरुवा लोग कहैं कि, वही जोहै अविनाशी सो सबके घटघट में
सबको नाच नचावै है औनटके वेष आपो नाचै है । सो कबीरजी शेखतकीसों
कहैं हैं कि, हे शेखतकी ! जो सबको नाचनचावैगो आपनटके वेष नाचैगो सो
अविनाशीकैसेहोइगो काहेते कि नटएक वेषलैआयोपुनि वह वेष छोड़िके और
वेष लैआयो याही भांति नानावेष नट धारणकरै हैं ते सब अनित्यहैं नाना वेष
धरिबो तौ मायाके गुणहैं वह मायाके परे कैसे होइगो औ जब मायाते परै
न होइगो तौ अविनाशी कैसे होइगो सो हे शेखतकी तुम सुनो वाहूबिचार करत
करत जो शेष रहिजायहै सो तुमहौ बातो तुम्हारहो अनुभवहै अथवा तुम शेषहौ
सो कार निराकार के परे जो साहब है ताको तुम शेष हौ कहै अंशहौ ॥ ५ ॥
इति तिरसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौंसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
काया कंचन यतन कराया।बहुत भांतिकै मन पलटाया॥१॥
जो सौवार कहौ समुझाई । तहिबो धराछोड़ि नहिंजाई ॥२॥
जनकेकहे जो जन रहिजाई।नवो निधि सिद्धी तिनपाई॥३॥
सदाधर्म तेहि हृदयाबसई । राम कसौटी कसते रहई ॥४॥
जोरि कसावै अंतै जाई । तौ बाउर आपुहि बौराई ॥ ५ ॥
साखी ॥ ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो शोच ॥
जहां संत तहँ संत सिधावै,मिलि रहे पोचै पोच ॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि ईजीवनके कायाको हम बहुत यतनकरवाया औ बहुत भांति
ते मन पलटाया कि तू धोखा कों त्यागि कंचन आपने स्वरूपको जानै॥ १ ?

( १५२ ) बीजक कबीरदास ।
याबात यद्यपि मैं सौबारसमुझाऊं हौं ताहूपै ऐसो धोखाको धरचो कि छोड़ि
नहींजाय सो जे जन गुरुवाजनके कहेराहिजायहैं धोखाकोनहीं त्यागै हैं ॥ २ ॥
तेनवोनिद्धि पावै हैं औ निर्गुण सगुणके परेमैं जोबातकहौं ताकोकहाँ बूझैं ॥३॥
जेमेरोकह्यो बूझैंहैं कि हमसाहबकेहैं याधर्मजिनके हृदयमें बसैहै तेसाहबके रूप-
कसौटी में आपनो कंचन स्वस्वरूप कसतई रहैं औ जेसाहब नहींकसैहैं
गुरुवालोगनके कसावैनाईहैं तेवेबाउरऊ निराकार ब्रह्म तांमें आपही बौरायजाय
हैं जो औरको औरकहै सो बाउर है ॥ ४ ॥ ५ ॥ सो हे जीवो ! तुम साहब
के होइकै धोखा में लगे ताहीते कालकी फांसीमें परेहौ सो आपने छूटिबे को
सोच करौ देखो तो जहां संत रामोपासकहैं तहें संतजाइहैं आपनोस्वरूपजानि
छूटिजाइहैं जे गुरवालोगनको उपदेश लेइहैं ते जीव पोच पोच मिलिरहेहैं॥६॥
इति चौंसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथपैंसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अपने गुणके औगुण कहहू।यहैअभाग जोतुम न विचारहू १
तुमजियरा बहुतैदुखपाया । जलबनमीनकवनसुचुपाया २
चातृकजलहल भरेजोपासा।मेघ न वरसै चलैउदासा॥३॥
स्वांग धरचोभवसागर आसा।चातृकजलहलआशैपासा४
रामै नाम अहै निजसारू । औ सब झूठ सकल संसारू ५
किंचित है सपनेनिधिपाई । हियनमाहँ कहँ धरै छिपाई६॥
हरि उतंग तुमजातिपतङ्ग । यमघर कियो जीवको संगा७
हियनसमाय छोड़नहिंपारा ।झूठलोभ तैं कछु न विचारा८
स्मृति कहाआपु नहिंमाना । तरिवर छलछागर हैजाना ९
जियदुरमति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझैवारनपारा १०

रमैनी । ( १५३ )
साखी ॥ अंधभया सबडोलई, कोइ नाहिं करै विचार ॥
हरिकि भक्ति जाने बिना, भव बूडिमुआ संसार १ १
अपने गुणके औगुण कहहू। यहै अभाग जो तुन न विचारहू ॥१॥
तुम जियराव बहुतै दुख पाया। जल विन मीन कवन सचु पाया २॥
चातृक जलहलहल भरे जोपासा । मेघनबरसै चले उदासा ॥३॥
स्वांग धरयो भवसागर आसा। चातृक जल हल आशै पासा ४॥
स्वतःसिद्ध तुम साहबके दासहौ या जो आपनो गुण ताको अवगुण कहौहै। कि
हम ब्रह्महैं सो यां नहीं बिचारौहै। कि हम ब्रह्महैं कि दासहैं याही तुम्हारी अभा-
गहै दासभूतमेतमान ॥(दासभूताःस्वतःसर्वेह्यात्मानःपरमात्मनः)॥ परमात्ममें बहुत
दुःख पायो है जो छाया पाठ होय तौ बहुत दुखमें आयो सो जब बिना कौनौ
सचु पायेहौ? नहीं पायो। ऐसे बिना साहबके जाने सचु न पावोगे?॥१॥२॥ जैसे जब
मेघ स्वातीको जल नहीं बरषैहै तब चातृक उदासै रहैहै कहै पियासै रहैहै जो नजीक
समुद्रौ भरोहोय तौ कहा होइ ऐसे स्वामी मेघसम रामोपासक पूरा गुरु तुमनहीं
पायो जो साहबको बताइदेइ ताते तुम उदासई गयो और और में लगावन वारे
गुरुवालोग जो उपदेशऊ कियो पै जनन मरण न छूट्यो ॥ ३ ॥ भवसागर ते
पारहोबे की आशाकरि स्वांगजो धोखा ब्रह्म तौनेको तुम धरचो कि अहं ब्रह्मास्मि
मानिसंसारते छूटिजाइँगे सो तुम्हारी आशा चातृककी भई कि स्वातीतौ पायो
नहीं जो बहुत जलहै पै बिना स्वाती चातृककी आशा फांसही हैगई अथवा स्वांग
धोखा ब्रह्म को जो तुमधरयो है सो साहबकी आशा कहै दिशानहीं है भवसागर-
हीकी आशाकहे दिशा है ॥ ४ ॥
रामैनाम अहै निजसारू । औसब झूठ सकल संसारू ॥ ५॥
किंचितहै सपने निधि पाई। हियनमाहँ कहँ धरै छिपाई ॥ ६ ॥
हरि उतंग तुम जानि पतंगा । यमघर कियो जीवको संगा॥७॥
हियन समाय छोड़ नहिं पारा। झूठ लोभ तैं कछु न विचारा॥ ८ ॥

( १६४ ) बीजक कबीरदास ।
स्मृतिकहा आपनहिंमाना। तरिवरछलछागरह्वैजाना ॥ ९ ॥
जियदुरमतिडोलैसंसारा । तेहिनहिंसूझै वारनपारा ॥ १० ॥
हे जीवो ! तुम यह बिचारत जाउ कि निज कहे आपनो सार रामै नाम
को साहब मुख अर्थ समझिकै संसार ते छूटोगे अर्थात् साहब को स्वरूप औ
तुम्हारो स्वरूप राम नामही में है औ सब कहे ब्रह्मई है यह जो मानि राख्यो
है सो धोखा है झूठा है औ मायिक जो सकल संसार है सो झूठा है अथवा
सकल संसार में और जे मत हैं ते सब झूठे हैं ॥ ५ ॥ अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान करै है
सो सपने कैसी है अर्थात् झूठी है तैंतो किंचित् कहे अणुहै वा बिभु है झूठलों-
भंत कछु न विचारा तुम्हारे हिये में ब्रह्म नहीं समाय है कहे तुम्हारो ब्रह्म
होइबो नहीं संभवित होइ है याको छोड़िदेव औ वाको पार नहीं है कहैं
लवरी और न होय है याते झूठ लोभकिये है कि, मैं ब्रह्महोइ जाउँगो सो कछु
न विचारा काहेते अच्छा विचारनहीं किये है अथवा कछु न विचारा कहै
वा विचार कछु नहीं है मिथ्या है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ जौन स्मृति बतावैहै ॥ (स्याज्जीव-
नेच्छाद्यदितेस्वसत्तायांस्पृहायदि । आत्मदास्यंहरेःस्वाम्यंस्वभावंचसदास्मर॥१॥)
सो तुम स्मृतिको कहा आप कहे आपनो स्वस्वरूप न मान्यो धोखाब्रह्ममें लगिकै
अपने को ब्रह्ममानिकै तरिवर जोहै संसार ताको छल जो है धोखा ब्रह्मसोइ है
छागकहे बकरा ताही ह्वैकै कहे वह ब्रह्मह्वैकै तुमजान्यो कि हम चरिलेइँ
अर्थात संसारते छूटिजाइँ सो एतो बड़ो संसार रूपी वृक्ष कहा धोखाब्रह्म
बकरा चरोचरिजाइ है ॥ ९ ॥ जौन जीमें दुर्मति करिकै संसारमें डोलौहौ कहे
फिरौहौ सो अहं ब्रह्म माने संसारको वारापार न पावोगे वहतो धोखा है॥ १०॥
साखी ॥ अंधभयासबडोलई, कोइनकरैविचार ॥
हरिकिभक्तिजानेविना, भवबूडिमुआसंसार॥ ११॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि मैं येतोसमुझाऊं हौं परंतु सबसंसार की आंखि फूटि-
गई हैं अंधभया सबडोलैहै कहे फिरैहै यह विचार कोई नहीं करै है भक्तनको
संसार दुःखहरै सो हरि जेहैं सबकेरक्षक परमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनकी अनु-
रागात्मिका भक्ति बिना जाने भव जोहै धोखाब्रह्म तौनैहै भ्रमको समुद्र
ताहीमें संसार बूडिमुआ कहे संसारी जीव बूडिमुये ॥ ११ ॥
इति पैंसठवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी। ( १५५ )
अथ छयासठवीं रमना।
चौपाई।
सोई हितू बंधु मोहिं भावै। जात कुमारग मारग लावै ॥१॥
सो सयान मारग रहिजाई। करै खोज कबहूं न भुलाई॥२॥
सो झूठा जो सुतकै तजई। गुरुकी दया रामको भजई॥ ३ ॥
किंचितहैयाहिजगतभुलाना। धनसुतदेखिभयाअभिमाना ४
साखी ॥ जिय जो नेक पयान किये, मंदिर भया उजार ॥
मरे जे जियते मरिगये, बाँचे वाँचन हार ॥ ॥५॥
सोई हितु वा बंधु मोको भावैहै जो कुमारगमें जात जे जीव हैं तिनको सुमा-
रगमें लैआवै कहे साहबको बतावै अथवा कुमारग में जात जो जीवहैं ताको साह-
बके सुमार्गमें लगावै॥१॥अरुसो ई जीव सयानहै जो सुमार्गमें आयकै रहिजायहै
कहे स्थिर ह्वैजाय है अरु और और मतनको खोज करिकै सबको सिद्धांत साहब
हीमें लगाइदेइ सो कवहूं न भुलाइ है ॥ २ ॥ ऐसो गुरुवा झूठा है जो सुतकै
कहैं, मूड़ मूड़िकै अपना चेला बनाइके तजिदेइ है साहब को नहीं बतावै है
औरे औरे देवनको सौंपिदेइ है औ जाकीदया ते अर्थात् जाकें उपदेशते यह
जीव श्रीरामचन्द्र को भजन करै है सोई सांचो गुरु है। भाव यह है कि बिना
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रजी के जाने यह जीव को शोक नहीं छूटै है जे गुरु साह
बको बताइकै संसारते नहीं छुड़ावै हैं औरे औरे मतन में लगाइकै संसारमेंडा-
रिदेईहैं ते अज्ञान दूरि करनवारे नहीं हैं वे नरक देन वारे हैं औ आप नरक
जानवारे हैं तामें प्रमाण ॥ ( शिष धनहरै शोकनहिं हरई । सो गुरु घोरनरकमें
परई॥ औकबीरहूजी लिखि आये हैं ॥(छोड़िदेहु नरझेलिकझेला । बूड़ें दोउगु-
रुअरुचेला ॥ ) हे जीवतू तो अणु हैं एकजो ब्रह्म औजगद्रूप जो है माया तामें
भुलाइरह्यो है याही ते तैं जगत्में उत्पन्न भयो है आपने को मालिकमानिधन
सुतादिको तोको अभिमान होइ है ॥ ३ । ४ ॥ हे जीव जो नेकहुपयान ते किये

( १६६ ) बीजक कबीरदास ।
स्थूल शरीर मंदिर उजार होइजाई है सो बिना परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके भजन जे
मरे जीवतौ मरिकै चौरासीलाख योनिमें भटकनेलगे औबाचे बाचनहार कहे जे
पांचौ शरीर ते बचिकै पार्षद रूप बाचन द्वार रहे ते बाचे ॥ ५ ॥
इति छयासठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सतसठवीं रमैनी ।
गुरुमुख चौपाई ।
देहहलाये भक्ति न होई । स्वांगधरेबहुते नर जोई ॥ १ ॥
धिंगाधिंगी भलो न माना।जोकाहू मोहिं हृदय न जाना २॥
मुखकछु औरहृदयकछु आना।सपन्यो कवहूं मोहिं नजाना ३
ते दुखपावैं यहि संसारा । जो चेतौ तौ होंहु निनारा ॥ ४ ॥
जो नर गुरुकी निन्दा करई । शूकर श्वानजन्मसो धरई ५
साखी॥लखचौरासीयोनिजीव, भटकि भटकि दुखपाव ॥
कह कबीर जो रामहिं जानै,जो मोहिं नीके भाव६
देहहलाये भक्ति न होई । स्वाँगधरे बहुतै नर जोई ॥ १ ॥
धिंगाधिंगीभलो न माना।जोकाहूमोहिंहृदय न जाना॥२॥
देह हलाये कहे पेट हलाय कुंडलिनी उठावै है औ स्वांगधरे कहे कोई खाख
लगावै है कोई जटा नहीं बढ़ावै है कोई टोपीदै अलफी पहिरि कुबरी लेइ है
कोईकोई तिलकैनहीं देय है कोई बेंडा तिलक देइ है कोई नाकते तिलक देइ
है कोई काठफल पाषाण अस्थि इत्यादि माला पहिरै है ऐसे स्वाँगधर नरनको
देखैहै सौबिना साहबके जाने भक्तिहोई है ? नहीं होइ है ॥१॥ धिंगाधिंगीकहे
बड़ेबड़े मालपुवा मोहनभोग खाय मोटायकै बडेबड़े धिंगा ह्वै रहे हैं औ बड़ी
बड़ी धिंगी ह्वैरही हैं भलो जो साँच मत ताको नहीं माने हैं साहब कहै
हैं जो कोई मोको हृदयते नहीं जानै है सो मोको पाव है ? नहा पावै है॥२॥

रमैनी । ( १५७ )
मुखकछु औरहृदयकछु आना।सपन्योकबहूंमोहिंनजाना॥ ३
तें दुखपावहिं यहिसंसार । जोचेतौतौहोहुनिनारा ॥ ४ ॥
जोनरगुरुकीनिन्दाकरई । शूकरइवानजन्मसोधरई ॥ ५ ॥
मुखमें तो और है कि, हम संन्यासी हैं हमसाधु हैं हमब्रह्मचारी हैं औ
हृदय में और है धनमिलैको उपाय खोजै हैं तेनर सपन्यो कबहूं मोकोनहीं
जानिसकैं हैं ॥ ३ ॥ सोऐसे जे प्राणी हैं ते यहिसंसार में दुःख नानाप्रकारके
पावै हैं सो हेजीवो ! तुम चेतकरौ तो इनसे न्यारा हैजाउ ॥ ४ ॥ औ जे
तात्पर्य्य वृत्तिकारिकै मोको बतावैं हैं ऐसे जे गुरु हैं तिनकी जोकोई निन्दाकरै
हैं कि, जोई वर्णन करै हैं सो सब मिथ्या है ते मरिकै श्वान अरु शूकरको
जन्म धारण करै हैं ॥ ५ ॥
साखी॥ लखचौरासीयौनिजीव, भटकिभटकिदुखपावै ॥
कहकबीरजोगमहिं जानै, सोमोहिंनीकेभावै ॥ ६ ॥
साहब कहैं हैं कि मेरोभक्त कबीर कहैहै कि चौरासी लाख योनिमें जीव
यह भटकि भटकि दुःख पावैहै सो तिनमें जोकोई श्रीरामचन्द्रको जानै सोई
मोको भावै है। ऐसो प्रकट कबीरबतावै हैं ताहूको और औरमें अर्थकरि और
और लगै हैं सो मोको नहीं जानै हैं ॥ ६ ॥
इति सतसठसवीं रमैनी समाप्त।
अथ अड़सठवीं रमैनी ।
चौपाई।
तेहिवियोगते भये अनाथा।परिनिकुंजन पावनपाथा ॥ १॥
वेदौ नकलकहै जे जानै । जो समझै सो भलो न मानै॥२॥
जटवर वन्द खेल जो जानै।ताकर गुण जो ठाकुर मानै॥३॥
उहैजो खेलै सबघटमाहीं। दूसर को लेखा कछु नाहीं॥४॥
भलो पोच जो अवसर आवै । कैसहुकै जन पूरा पावै॥५॥

( १९८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ जेकरे शरलागै हिये, तब सो जानैगा पीर ॥
लागतौ भागै नहीं, सुखसिंधु निहारु कबीर॥६॥
तेहिवियोगतेभये अनाथा । परिनिकुंजवनपावनपाथा॥१॥
वेदौनकल कहै जोजानै । जो समुझैसोभलो न मानै ॥२॥
संपूर्ण जे जीव हैं ते परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनहीं के वियोगते अनाथ
ह्वैगये। निकुंज बन जो बाणीको जालहै नाना मत जिनमें परिकै एक सिद्धान्त
मत परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके मिलनके पाथ कहे पंथ न पावत भये ॥ १ ॥
जिनको पूर्व कहिआये कि साहब को नहीं जानै स्वांगभर बनावै हैं तिनको हे
जीवो! जो तैं जानै तौ वेदहू वे मतवारेन को नकलई कहै हैं तौ जो साहब को
समुझैहै सोऊ उनको नहीं मानै है नकलई मानै हैं ॥ २ ॥
नटवरवंद खेल जो जानै । ताकरगुण जो ठाकुरमानै॥३॥
उहैजो खेलैसवघटमाहीं । दूसरकोलेखा कछुनाहीं ॥४॥
भलोपोच जो अवसर आवै । कैसे कै जनपूरा पावै ॥५॥
अब योगिन को कहैहैं। नट कैसे बंटा जो कोई खेलै जानै है कहै यहजीव
आत्माको ब्रह्मांडमें चढ़ाइकैकै फिरिउतारै जानै है ताको गुण यहहै कि, समाधि
लगि जाइहै कहे ब्रह्मरूपह्वैजाइहै सो वही ब्रह्मको जो कोई ठाकुर मानैहै ॥ ३॥
अर्थात् जौनब्रह्ममें है ताउहौं तौने घटमें है दूसरेकी कछुनहीं लगै है अर्थात्
दुंसरो पदार्थ कछुनहीं है ॥ ४ ॥ सो जे यहमत करैहैं तिनको भलो पोचं-
कहे नीको नागा अवसर आवतहै अर्थात् जब जीवमें लीन है ब्रह्मरूप ह्वैजा-
इहै यातो भलो अवसर। औ जब समाधि उतरिगई जैसेकै तैसे ह्वैगई या पोच-
अवसरहै सो कैसे कै जन पूरो ज्ञान पावै कि हम पूर्णब्रह्महैं तो सर्वत्र पूर्ण
है जो या ब्रह्महै तातो तो समाधिउतरेहूमें वही वृत्ति बनी रहती ॥ ५ ॥
साखी ॥ जेकरे शरलागै हिये, तब सो जानैगा पीर ॥
लागतौ भागै नहीं, सुखसिंधु निहारु कबीर ॥६॥

रमैनी । (१५९)
जेकरे शरलागैहै सोई बाणलागे की पीर जानै सो जोः कोईसमाधि लगावै
है सोई समाधि उतरेको दुःख जानैहै सो समाधि तौ तोर लागैहै ना भागु
समाधिही लगाये रहु सो तेरो भागिबो तौ बनतई नहीं है समाधि उतरेही
आवैहै याते यह धोखा छोड़िदे कबीरजी कहै हैं सुखसिंधु जे साहबहैं तिनको
निहारु जिनको एकबार निहारे समाधि लगी रहैहै अर्थात् जो एकहूबार साह-
बके सम्मुख भयोहैः सो फिरिनहीं संसार में बच्योहै तामेंप्रमाण ॥ ( एकोपि
कृष्णस्यकृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेनतुल्यः ॥ दशाश्वमेधीपुनेरेतिजन्मकृष्ण-
प्रणामीनपुनर्भवाय ॥ इति ) अथवा जाके बाण लगै है सोई पीर जानै है सो
जो साहब में लागे हैं तेई धोखाकी पीर जानै हैं कि हमयोगमें यज्ञादिमें लगि
कै नाहक जन्म गँवाये।सो कबीर जी कहै हैं कि साहबको दुर्लभजानि तैं लागु
तौभागु न साहब सुखसिंधुहै तिनको तूनिहारु तौ ये सब धोखनकी पीर दूरि
करि देयँगे तब अपराध तेरो न गनैंगे । तामें प्रमाण॥"कथंचिदुपकारणकृतेनैके
नतुष्यति ॥ नसंमरत्यपकाराणांशतमप्यात्मवत्तया" इतिबाल्मीकीये ॥ ६ ॥
इति अड़सठवीं रमनी समाप्त।
अथ उनहत्तवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ऐसा योग न देखा भाई । भूला फिरै लिये गफिलाई ॥१॥
महादेवको पंथ चलावै । ऐसो बड़ो महंत कहावै ॥ २ ॥
हाट वाट में लावै तारी । कञ्चे सिद्धन माया प्यारी ॥ ३ ॥
कबदत्तै मावासी तोरी । कव शुकदेव तोपची जोरी ॥४॥
कब नारदबंदूक चलाया। ब्यासदेव कब बंब बजाया ॥५॥
करहिं लड़ाई मतिकेमंदा।ईहैं अतिथि किं तरकशबंदा॥६॥
भयेविरक्त लोभमनठाना। सोना पहिरि लजावै बाना ॥७॥
घोरा घोरी कीन्ह बटोरा । गांवपाय यश चलो करोरा ८॥

( १६० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ तियसुन्दरी न सोहई, सनकादिक के साथ॥
कवहुंक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ९ ॥
ऐसा योग न देखाभाई । भूला फिरै लिये गफिलाई ॥१॥
महादेव को पंथ चलावै। ऐसो बड़ो महंत कहावै ॥ २ ॥
हाटबाट में लावै तारी। कच्चे सिद्धन माया प्यारी ॥ ३ ॥
कव दत्तै मावासी तोरी। कव शुकदेव तोपचीजोरी ॥ ४ ॥
श्रीकबीर जी कहैहैं कि ऐसा योग हम नहीं देख्यो है कि साहबको तो
जानै नहीं हैं गाफिल ह्वैकै भूले भूले फिरै हैं ॥ १ ॥ अरु महादेव को पंथजो
तामस शाखहै सो चलावै हैं औ बड़े महंत कहावै हैं ॥ २ ॥ सबके देखावन
को हाट में औ पहारन के बाट में तारी लगायकै बैठै हैं औ सिद्धकहावै
हैं औ सबके देखावन को यह कहैं हैं कि संन्यासीको धर्मनहीं है कि
द्रव्यलेय औ हाथछुवै परंतु जो कोई चढ़ाइक चलौ जाइहै ताको चिमटाते
लैकै कमंडलुमें डारिलेइ हैं सो ऐसे कच्चे सिद्धन को माया बहुत प्यारी
लगैहैं ॥ ३ ॥ दत्तात्रेय कबै मवासिनको शत्रुन को तौरचोहे औ शुकदेव कबै
तोपखाना अपने साथ जोरिकै चलायो है ॥ ४ ॥
कब नारद बंदूक चलाया । ब्यासदेवकवंबंबबजाया ॥५॥
करहिंलराई मतिकेमंदा । ईहैंअतिथिकितरकसबंदा ॥६॥
भये विरक्त लोभ मनठाना। सोनापहिरि लजावैबाना ॥७॥
घोराघोरी कीन्ह बटोरा । गाँवपायशचलो करोरा ॥८॥
औ नारद मुनि कबै बंदूक चलायो है औ ब्यासदेव कबै नगारादैकै काहूकें
ऊपर चढ़ेहैं ॥ ५ ॥ ई संन्यासी बैरागी मतिके मंद लड़ाई करै हैं ई
अतिथि हैंकि, तरकस बन्दसावंतहैं?॥६॥ भये तौ बिरक्त संन्यासी परंतु लोभ

रमैनी। ( १६१ )
कारिकै रोजगार करै हैं सोना पहिरि कै बानाको लजावै हैं ॥ ७ ॥ औ
घोरा घोरी हाथी बहुत आपने संगलेत भये औ काहू राजाते गांव पायो करोर-
पती है या यश चलायो बड़े ज्ञानीहैं बड़े भक्तहैं या यश चलायो ॥ ८ ॥
साखी ॥ तियसुन्दरी न सोहई,सनकादिक के साथ ॥
कवहूंक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ९ ॥
लाव लश्कर में स्त्री साथ रहतई है सनकादिक जटाधारे वैष्णवनको कहैहैं
अथवा सनकादिक कहे जिनकी पांच वर्षकी अवस्था बनीरहैहै ऐसेब्रह्माकेपुत्र
तिनहूको या मजाहोयतोकबीर जी कहै हैं कि संन्यासिनके साथमें सुन्दरीका सों-
हहै ? नहीं सोहैहै कबहूं दाग लगावतईहै जैसे कारी हांडी हाथमें लेइँ तो दाग
लागिही जायहै ऐसे जिनके जिनके संगमें स्त्रीरहैहै ते पाखंडिनको दाग लगतै है
स्त्रीनते नहीं बचैहैं। नामके तोसंन्यासी बैरागीहैं अखाड़ा गृहस्थी बांधेहैं तहां स्त्री
आवई चाहैं सो दाग लगावई चाहैं अथवा ऐसे पाखंडीहैं ते माया रूपई ह्वैरहेहैं तेई
मायारूपी सुन्दरी कहे स्त्रीहैं तिनको संग न करै औ जो संग करै तौ दाग लगवई
करै सो जीव ते पाखंडिनको संग न करै तामेंप्रमाण ॥(पुंसांजटाधरणमोजवतां
वृथैव मेधाविनामखिलशौचनिराकृतानाम् । तोयप्रदानपितृपिण्डबहिःकृतानां संभा-
षणादपिनराःनरकंप्रयांति ) ॥ इतिविष्णुपुराणे ॥ ९ ॥
इति उनहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बोलनाकासों बोलियेभाई । बोलतही सबतत्त्वनशाई॥१॥
बोलतबोलत बाढु विकार। सोबोलिय जोपरैबिचारा॥२॥
मिलैजोसंतबचनदुइकहिये । मिलैअसंत मौनह्वै रहिये॥३॥
पंडितसों बोलियहितकारी । मूरखसों रहिये झखमारी॥४॥
कह कबीर ई अधघट बोलै । पूरा होय विचार लैबोलै॥५॥
११

( १६२ ) बीजक कबीरदास ।
बोलाना कासोंबोलियेभाई । बोलतही सवतत्त्वनशाई॥१॥
बोलतबोलतवाढु विकारा सोवोलियो जो परैविचारा ॥ २ ॥
बैरागिनकी संन्यासिनकी दशा जैसी हैरही है सो पूर्बकहिआये सो ऐसे
पाखंडी संसारमें है रहेहैं बोलानाकासों बोलिये बोलतहीमें सब तत्त्व नशाइ
जाइहै। तत्त्वकहावैहै यथार्थ सो साहब के जे नामरूप लीला धाम यथार्थ हैं ते नशाइ
जाइहै कहे भूलिजाइहैं ॥ १॥ बोलत बोलत बिकारई बाढ़ैहै ताते सो बात बोलि-
ये जेहिते साहब के नामादिकन को बिचार ठीक परिजाइ कौनी तरहते सांच
बिचार ठीक परै सो कहै हैं ॥ २ ॥
मिलैजोसंतवचनदुइकहिये । मिलैअसंतमौनह्वैरहिये ॥३॥
पण्डितसोंबोलियहितकारी । मूरखसोंरहियेझखमारी॥४॥
जो संत मिलैतो द्वैबचन कहबऊ करिये द्वैबचन कह्योताको भाव यहहै कि
थोरई अपने मयोजन मात्र बोलिये औ सत्संग करिये काहेते कि उनके सत्संग
किये बिचार बाढ़ैहै औ असंत मिलै तो मौन ह्वै रहिये बोलिये न काहेते कि
उनके संगते अज्ञान बाढ़ै है ॥ ३ ॥ तेहिते पंडितसों बोलिबो हितकारीहै काहेते
कि पंडित जेहैं ते सारासारको विचार करिकै सार पदार्थ जे साहब तिनको
ठीक करिकै असार जोहै धोखा ब्रह्म औ माया ताको छोड़ि दियोहै वे साहबको
बतावेंगे औ मूरख सों बोलिबो झकमारीहै काहेते कि जो मूरख सों बोलै तौ
अपने स्मरणकी हानिहोइ है वह तो समझायेते समझैगो नहीं तबआपही झक-
मारि कै रहिजाइगो पीछे क्रोध होइगो अरु मूरख नहीं समझैहै तामेंप्रमाण
गोसांई जीको॥ सोरठा ॥ “फूलैनफूलैबेत, यदपिसुधाबरषैजलद॥ मूरखहृदयन-
चेत, जोगुरुमिलैंबिरंचिसम” ॥ १ ॥ पानीकोपान भीजै तो बेधैं नहीं । त्यों मूर-
खको ज्ञान बूझावै तौ सूझैनहीं ॥ ४ ॥
कहकबीरई अधवट डोलै । पूराहोय विचार लैबोलै ॥ ५ ॥
श्रीकबीरजी कहैंहैं कि जे सत्संगऊ करैं हैं औ मूरखहू सों बोलै हैं शास्त्रार्थ
करै हैं औ और और मतको सिद्धांतको जानो चाहैंहैं कि हमारे मत ठीकहै कि
औरऊमतठीकहै परमपुरुष श्रीरामचन्द्र सबते परे हैं यह सिद्धांतको निश्चय नहीं है

ते अधवटजेहैं और और मतवारे इनकेसमुझाये नहीं समुझैं हैं। औ असंत संगकरिकै
विचारकी हानिहोइहै। कहाहानिहोइहै? कि औरऊको विचारमन पर न लागै है अपने
मतमें भ्रमहोन लगैहै आपनो ठीकनहीं वह ठीकहै जैसे आधी गगरी जलसे भरीहोइ
तो वाकोजल डोलैहै ऐसे साहबमें उनको ज्ञानतो पूरो नहीं ताते डोलैहै औ जो
पूरा सो बीचैलैकै बोलैहै और प्रश्न सुनिकै वाकोविचार लैलियो कहे समझि
लियो कि यह बोलिबो अधिकारी है हमारो कह्यो समुझैगो तब बोलैहै जैसे
भरी गगरी को जल नहीं डोलै है और जल वामें नहीं समाय है ऐसे वे तों
साहबके ज्ञान म पूर हैं सो उनको ज्ञान डोलै नहीं है अरु और मतनको सिद्धांतके
जे ज्ञान हैं ते उनके अंतःकरणमें नहीं समायहैं ॥ ५ ॥
इतिसत्तरवींरमैनी समाप्त ।
अथ इकहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
सोग वधावासम करिमाना । ताकी बातइन्द्रनहिंजाना ॥ १॥
जटातोरि पहिरावै सेली। योग युक्तिकै गर्भ दुहेली ॥ २ ॥
आसनउड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चील्ह मड़राई ॥ ३ ॥
जैसी भिस्त तैसि है नारी । राजपाट सब गनै उजारी ॥ ४॥
जैसे नरक तसचंदन माना। जसबाउर तसरहैसयाना ॥ ५॥
लपसी लौंग गनै यकसारा । खांड़ै परिहरि फांकै छारा ॥ ६॥
साखी ॥ यह विचार ते बहि गयो, गयो बुद्धि बल चित्त ॥
दुइ मिलि एकै है रह्यो, काहि बताऊ हित्त ॥ ७ ॥
सोगबधावा समकरिमाना । ताकीबात इंद्रनहिंजाना ॥ १॥
जटातोरि पहिरावै सेली । योगयुक्तिकै गर्भ दुहेली ॥ २ ॥

( १६४ ) बीजक कबीरदास ।
आसन उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे कागचीलहमड़राई॥३॥
जैसीभिस्ति तैसि है नारी । राजपाटसवगनै उजारी ॥४॥
औरै पदको अर्थ स्पष्टै है ॥२।३। अब फिरि साहब के जनैयनकों कहैहैं
कि भिस्तिकहे स्वर्गको मानैहै तैसेनारीकहे दोजख को मानैहैं अरबीकी कि-
ताबनमें भिस्तिकों जिन्नत औ दोजखको नारी अर्थकै सम्बन्धते बहुत जगह
कह्योहै अथवा नारकहे आगि सोजामें होय ताको नारीकहैंहैं अर्थात् नरक और
भिस्ति पाठहोय तोजैसे भिस्तिकहे देवालको मानैहैं तैसे नारीको मानैहैं और
राजपाट जोहै जगत ताको उजारई गनैहैं कि संसार हई नहींहै चित अचितरूप
साहबईके हैं नरक स्वर्गादिक तामें प्रमाण ॥ “नरक स्वर्ग अपबर्ग समाना ।
जहँ तहँ देखि धरै धनु बाना” ॥ ४ ॥
जैसे नरकतसचंदनमाना । जसबाउर तसरहैसयाना ॥५॥
लपसीलौंगगनै यकसारा । खांडै परिहरिफांकैछारा ॥ ६ ॥
जैसे नरककहे बिष्ठाको तैसे चन्दनको मानैहैं औ हैंतौ सयान कहे साहब कों
जानैहैं परन्तु रहतबहुत बाउरही के तरहहैं ॥५॥ औ जे साहबको नहीं जानैहैं
आपहीको ब्रह्म मानैहैं तिनकोकहैंहैं लपसी लौंगको एकई मानैहैं खांड़ छोड़िकै
छारको फांकैहैं अर्थात् ताहूको एकही गनैहैं सर्वत्र एकही ब्रह्म मानैहैं जो
कहो समान दृष्टि करतईहैं साहबके गैर जनैयन कहे जाननवारे हैं ये आपहीकों
ब्रह्म मानैहैं औ खांड़ परिहरिकै छार फांकैहैं ताको भाव यहहै खांड़ साहबजें
मिठाई ताके देनेवारे तिनकों छांड़ि के छारफांकै हैं जामें सारकछुनहीं है
अहंब्रह्मास्मि ज्ञान करैहैं ॥ ६ ॥
साखी ॥ यहिबिचारते बहिगयो, गयीबुद्धिबलचित्त ॥
दुइमिलि एकै है रह्यो, मैं काहिबताऊं हित्त ॥ ७ ॥
श्रीकबीरजी कहैह बिचारतबुद्धिको बलजोहै निश्चयकरिकै अहंब्रह्म मानि
सो येहू जातरह्यो औ चित्तजोहै सोऊ जातरह्यो मनोनाश बासना क्षय ह्वैगई
कछु बासना न रहगई दुइ जेहैंब्रह्म औ जीव ते मिलिकै एकही है रहे जैसे

रमैनी । ( १६५ )
जल मिलिकै एकै है जायहै । हितुवा वहकहावै है। जो रक्षा करै ये तो दोनों एकई
द्वै रहे ब्रह्म में लीनहोइ पुनि जब सृष्टिसमय भई तब माया धरि लै आवै है तब
तो दूसरो यह मानतै नहीं है मैं काको हितुवां बताऊं जो मायाते रक्षा करिलेइ
औ जोसाहब हितुवामानै रक्षकमानै तौ साहब याको हंसस्वरूप देकै आपने पास
बोलाइलेइ इहांमायाकीगति नहींहै ता पुनिधरिके जीवको संसारी कैसे करै?॥७॥
इति इकहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
नारि एक संसारै आई । माय न वाके बाप न जाई ॥ १ ॥
गोड़ न मूड़ न प्राणअधारा । तामें भरमि रहा संसारा ॥२॥
दिना सातलों वाकी सही । बुधअधबुधअचरजयककहही॥३॥
वाहिकिबन्दनकरसबकोई।बुधअधबुधअचरजबड़ होई ॥४॥
एक नारि जो यह मायौहै सो संसार में आवतभई न वाके मंहतारी है आ न
वह बापते उत्पन्नहै अर्थात् अनादिहै ॥ १ ॥ अरु न वाके गोड़हैं न मूड़ है न
प्राणहै न आधार है अर्थात् निराकारहै भर्मैहै ताहीमें संसार भरमिरह्यो है॥२॥
औ सातो जे बारहैं दिन तिनमें वही मायाकी सहीहै अर्थात् कालमें वही अमि-
सैहै औ सातोंबार वोई फिरि फिरि आवैहैं वही मायाको चारोंओर बिस्तारहै
बुधजौहै पण्डित निर्गुणवारे जे सारासारके बिचारकारिकै आपहीको ब्रह्ममानैहैं
औ अधबुधेजैहैं आधेपण्डित सगुण उपासनावारे सो ये दोनोंमें आश्चर्य जोहै
माया ताको एक कहैहैं दोनोंमें यह माया बरोबरि व्याप्तहै ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी
कहैहैं कि यह बड़ो आश्चर्य्य है तौ कछुनहीं है औ वही मायाकी बन्दना निर्गुण-
सगुणवारे दोऊकरैहैं जो मन बचनमें आवैहै सोमायाहीहै ॥ ४ ॥
इति बहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।

( १६६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ तिहत्तरवीं रमैनी ।
गुरुमुखचौपाई ।
चलीजातिदेखोयकनारी । तरगागरिऊपरपनिहारी ॥ १ ॥
चलीजातिवहबाटैवाटा । सोवनहारकेऊपरखाटा ॥ २ ॥
जाड़नमरैसुपेदीसौरी। खसमनचीन्हैघरणिभैबौरी ॥ ३ ॥
सांझसकारदियालैलैवारै। खसमछोड़िसुमिरैलगवारै ॥ ४ ॥
वाहिके सङ्गमें निशिदिनराँची। पिय सों वात कहैनहिँसाँची
सोवत छाड़िचली पिय अपना। ईदुखअवधौंकहौंकैहिसना
साखी ॥ अपनीजाँघ उघारिकै, अपनी कही न जाय ॥
की जानै चित आपना, की मेरोजन गाय ॥७३॥
चलीजातिदेखीयकनारी । तरगागरिऊपरपनिहारी ॥ १ ॥
चलीजात वहबाटैबाटा । सोवनहार के ऊपर खाटा ॥ २ ॥
सुरतिरूपी जोनारी सोईहै दूतीताकोहम चलीजातदेखाहैहृदयजोगगरी है सो
तरैहै औसुरति उठीसाऊपर सुधासरोवर में जल भरनको गई शीशमें पहुंची १॥
वह सुरति जबचलैहै तब षटचक्र बेधिकै राहराह जायहै काहेतेकि नाभीमें
मणिपुरक चक्रहै तामें शीशादिये नागिनी बैठीहै सोई षटकहे पलँगहै सो ऊपरहै
ताके नीचे सोवनहार जो है आत्मा सोरहैहै तहांते सुरतिउठैहै तहां ज्वाला साथ
नागिनी उठावै ताही साथ प्राणजायहै ॥ २ ॥
जाड़नमरैसुपेदी सौरी । खसमनचीन्हैघरणिभैबौरी ॥३॥
सांझसकार दियालैलैवारै । खसमछोड़िसुमिरै लगवारै॥४॥
सुपेदी कहें रजाई जोहै यह शरीर सो जाड़नमरै है अर्थात् शीत उष्ण
वहीको लगैहै सौरीकहै सुपेदीको सुमिरणकारैकैजाड़नमरैहै अर्थात् जबलग देहा-

भिमानहै तबलग शीतउष्णहैआत्माको नहीं लगैहै साहब कहैंहैं । कि वह जोहैं
आत्मामेरी घराणि कहे स्त्री अर्थात् जीवरूपा मेरीशक्ति सो मैं जो हौं याकों
खसमताको नहीं चीन्हहै त्यहिते बौरीकहे बौरायगई ॥ ३ ॥ साँझ सकार
दियालैबारैहै कहे समाधिलगायकै ज्योति को बारिकै कुंडलिनी उठाइ आत्माकों
लैजाइकैकै वही ज्योतिमें मिलाये है औ याको मैं खसमहौं सो मोको छोड़िकै
लगवार जोहै धोखा ब्रह्म ताको सुमरै है ॥ ४ ॥
वाहिकेसँगमेंनिशिंदिनराँची । पियसोंवातकहै नहिंसाँची ५
सोवतछांड़िचली पियअपना । ईदुखअवधौंकहवक्याहिसना
सुरतिरुपी नारीजो है दूती ताहीके साथद्वैकै वहीधोखा ब्रह्म में निशिदिन
रचिरही है कहे प्रीतिकरिरही है पियजोमैं हौं तासों सांचीबात नहींकहैहै सांची
बात कहाहै कि मैं तिहारोहौं यहनो कहै तौ मैं जीवरूपा शक्तिको छोड़ाइलेउँ
साहबकी यह प्रतिज्ञा है जो मोको जानै मोकोगोहरावै तौमेंसंसारते छुड़ाइलेउँ तामें
प्रमाण॥ "अबहूंलेउँ छुड़ाय काल ते जोवटसुरति सम्होरै" ॥५॥ सो जीवरू-
पाशक्ति मोको न जान्यो मोको न गोहरायो सोवत रहि गई जागत न भई
सोवतमें मोकोछोड़ि स्वप्न देखनवाली संसारीद्वैगई अर्थात् मोहरूपी निद्रा जब
प्राप्तभई तब संसार में परि कै नाना दुःखपावैहै सो यहदुःख अपनो कासों
कहै सांच जो मैं ताको तौ जानै नहीं है अरु और सब स्वप्नते झूठे हैं ॥६॥
साखी ॥ अपनीजाँघउघारिकै, अपनी कही न जाइ ॥
कीजानै चितआपना, कीमेरो जन गाइ ॥ ७ ॥
साहब कहै हैं कि यहिभांति मेरी जीवरूपाशक्ति मोकोछोड़ि कै संसारीद्वै
गई सो अपनीजंघा जो उघारिहोइ तौ कोई कहां अपनोगिल्ला करै है नहीं
करैहै ऐसे मेरी शक्ति यह जीव सो जो और और लगवार जोहैं सो यह दुःख
का मोसों कहिजाइहै नहीं कहिजाइहै कि तो मेरो दिल जानैहै याको उद्धार द्वै
जाइ याही चाहौंहौं औ कि मेरेजन जेहैं ते मेरो सौशील्य दया बात्सल्यादिक
गुणगान करिकै जानै हैं कि साहबमें निर्दोष सौशील्यादिक गुणहैं जीवको उद्धार

( १६८ ) बीजक कबीरदास ।
चाहै हैं और तो अज्ञानी जीव अपनो भूल न जानेंगे याहीजानेंगे कि जो साहब
सबको मालिकहै सब करिवेको समर्थहै ताकी जो इच्छा होती तौ हमसब जीवके
बंध ते तामेंप्रमाण॥ “सोपरंतु दुखपावत शिर धुनिधुनिपछिताय। कालहि कर्महि
ईश्वरहि मिथ्यादोष लगाय” ॥ ७ ॥
इति तिहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौहत्तरवीं रमैनीं ।
चौपाई ।
तहिया गुप्त थूलनाहिं काया। ताके सोग न ताके माया॥१॥
कमल पत्र तरंग यकमाहीं। सङ्गहिरहै लित पै नाहीं ॥२॥
आश ओस अंडनमँह रहइ। अगणित अंड न कोईकहई॥३॥
निराधार आधार लैजानी । रामनाम लैउचरी वानी॥४॥
धर्मकहै सब पानी अहई । जातीके मन वानी रहई॥ ५ ॥
ढोर पतंग सरै धरिआरा। तेहि पानी सब करै अचारा॥६॥
फंद छोड़ि जो बाहर होई । बहुरि पंथनाहिं जोहै सोई ॥७॥
साखी ॥ भर्मक बांधल ईजगत, कोइ न किया विचार ॥
हरिकि भक्तिजानेविना, भवबूडि मुवासंसार॥८॥
तहियागुप्त थूलनाहिंकाया । ताकेसोगनताके माया ॥ १ ॥
कमलपत्र तरंगयक माहीं । संगहिरहै लितपै नाहीं ॥ २ ॥
आशओसअंडनमँहरहई । अगणितअंडनकोईकहई ॥३॥
निराधारआधार लैजानी । रामनाम लैउचरीबानी ॥ ४ ॥

जबजीव भूल्यो है तहिया कहे तब स्थूल शरीर नहीं रह्यो औ गुप्तकहे
सूक्ष्म कारण महाकारण येशरीर नहीं रहेहैं औ न तेहिजीवके सोगरह्यो औ
न मायारहीहै ॥१॥ जैसेकमल पत्रमेंजल रहैहै पै कमलपत्र म लिप्त नहीं रहै
है तैसेयह आत्मामें माया ब्रह्म यद्यपि सब कारण रहै हैं । परन्तु माया ब्रह्ममें
आत्मालिप्त न रह्यो ॥ २ ॥ ब्रह्मह्वैबेकी जो आशाहै ताईपियासह्रै सो ओसचाटे
कहूं पियास जाइहै ओसके समजौहै ब्रह्मानंद सो जीवरूपजैहैं अंड तिनमें
रहैहै अर्थात् कारणरूपते जीवमें बनो रहैहै जब समष्टिजीवरह्योहै तब रहैतौ
अगणितहैं अंड परंतु सब मिलि एकई कहावत रह्योहै अगणित कोई नहीं कहत
रह्यो ॥ ३ ॥ निराधार जो निराकार ब्रह्महै जामें सबजीव भेरैहैं ताको आधा-
रलै जानिये कि साहबके लोक में है अर्थात् साहेबके लोकको प्रकाशहै तबतो
समष्टिरही याही रामनाम लैकैबाणी उचरीकहे प्रकटभई इहां रामनाम लैकै
बाणीप्रगटभई ताकोहेतु यहहै कि बाणीमें जगत प्रगटकरिबेकी शक्ति नहीं रही
रामनामको जगत् मुख अथ लैकैबाणी उचरीहै पांचोब्रह्म समत जगत् उत्पत्ति-
कियोहै सोई इहां सिद्धांत करै है ॥ ४ ॥
धर्मकहै सब पानी अहई । जातीके मन वानी रहई ॥५॥
ढोरपतंगसरै घरिआरा । तेहिपानीसबकरै अचारा ॥ ६ ॥
फन्दछोड़िजो बाहरहोई । बहुरिपन्थ नहिं जोहैसोई ॥ ७ ॥
वेदशास्त्रमें आत्माको धर्म कहै हैं कि आत्माचितहै याते चित धर्महै जैसे
जलमें जलमिलै तो एकई होजाइहै ऐसेचिन्मात्र जो ब्रह्महै तामें मिलिकै चित्त-
जोहै जीव सोएकई ह्वैजाय काहेते कि दुहुनको चितधर्म एकईहै औ जातीकहे
सब जाति जेजीवहैं ते आपने स्वस्वरूपको चीन्हें हैं कि मैं साहबको अंशहौं जाति
कारिकै वहींहौं कछु स्वरूप करके नहींहौं भेद बनोई है बह सर्बज्ञहै मैं अल्पज्ञहौं
वह बिभुहै मैं अणुहौं वहस्वतंत्र है मैं परतंत्र हौं यह जो कहैहैं कि आत्मा
ब्रह्मई है सोतौ बाणीको बिस्तारहै सामान्यधर्मलैकै कहैंहैं ॥ ५ ॥ ढोर पतंग
घरिआर आदिक जामें सरै हैं ताही जलमें सब आचार करै हैं अर्थात् जौनी-

( १७० ) बीजक कबीरदास ।
बाणी में सब मरि मरि समाइ है और पुनि वहीते उत्पत्ति होइहै औ जोन
सबजीवको फंडायेहै तौनीही बाणीमें कहे सब आचारकरैहैं अथवा वही बाणीकों
आचरणकरै है अपनेको ब्रह्ममानैहै काहूको आचार ठीक नहीं है ॥ ६ ॥ यह
बाणीके फंदते बाहरह्वैकै परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनमें जो लागै तो पुनि
जगतके पन्थको न जोहै अर्थात् फिरि न जगतमें आवै ॥ ७ ॥
साखी ॥ भर्मकवांधलईजगत, कोइनाहिंकियाविचार ॥
हरिकीभक्तिजानेबिना, भवबूड़िमुवासंसार ॥८॥
यहि भांति भर्म जोमाया सबलित ब्रह्म त्यौहिकरिकैबँध्यो जो यह संसारहैं
ताको कोई नहीं बिचार कियो हरि कहे सबके कलेश हरनहारे वेद तात्पर्यार्थ
जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनकी भक्ति के बिनाजाने भर्मके समुद्रमें संसार बूड़ि मुवा
कहे संसारीजीव बूड़ि मुयो ॥ ८ ॥
इति चौहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ पचहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
तेहिसाहवके लागोसाथा । दुइ दुखमेटिंकै होहुसनाथा॥१॥
दशरथकुलअँवतरिनहिंआया।नहिंलंकाकेरायसताया॥२॥
नहिं देवकिक गर्भहिआया।नहींयशोदा गोद खेलाया॥३॥
पृथ्वीरमनदमननहिंकारिया ।पैठिपतालनहींवलिछलिया४
नहिंवलिरायसोमांडीरारी । नहिंहिरणाकुशबधलपछारी५
वराहरूपधरणीनहिंधरिया।क्षत्रीमारि निक्षत्रनकरिया॥६॥
नहिंगोवर्द्धनकरतेधरिया । नहींग्वालसँगबनबनफिरिया ७
गण्डकशालग्रामनशीला।मत्स्यकच्छह्वैनहिंजलहीला॥८॥
द्वारावती शरीर न छांड़ा।लै जगनाथ पिंड नहिं गाड़ा॥९॥