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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

( १६८ ) बीजक कबीरदास ।
चाहै हैं और तो अज्ञानी जीव अपनो भूल न जानेंगे याहीजानेंगे कि जो साहब
सबको मालिकहै सब करिवेको समर्थहै ताकी जो इच्छा होती तौ हमसब जीवके
बंध ते तामेंप्रमाण॥ “सोपरंतु दुखपावत शिर धुनिधुनिपछिताय। कालहि कर्महि
ईश्वरहि मिथ्यादोष लगाय” ॥ ७ ॥
इति तिहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौहत्तरवीं रमैनीं ।
चौपाई ।
तहिया गुप्त थूलनाहिं काया। ताके सोग न ताके माया॥१॥
कमल पत्र तरंग यकमाहीं। सङ्गहिरहै लित पै नाहीं ॥२॥
आश ओस अंडनमँह रहइ। अगणित अंड न कोईकहई॥३॥
निराधार आधार लैजानी । रामनाम लैउचरी वानी॥४॥
धर्मकहै सब पानी अहई । जातीके मन वानी रहई॥ ५ ॥
ढोर पतंग सरै धरिआरा। तेहि पानी सब करै अचारा॥६॥
फंद छोड़ि जो बाहर होई । बहुरि पंथनाहिं जोहै सोई ॥७॥
साखी ॥ भर्मक बांधल ईजगत, कोइ न किया विचार ॥
हरिकि भक्तिजानेविना, भवबूडि मुवासंसार॥८॥
तहियागुप्त थूलनाहिंकाया । ताकेसोगनताके माया ॥ १ ॥
कमलपत्र तरंगयक माहीं । संगहिरहै लितपै नाहीं ॥ २ ॥
आशओसअंडनमँहरहई । अगणितअंडनकोईकहई ॥३॥
निराधारआधार लैजानी । रामनाम लैउचरीबानी ॥ ४ ॥