कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६४ ) बीजक कबीरदास ।
आसन उड़ाये कौन बड़ाई । जैसे कागचीलहमड़राई॥३॥
जैसीभिस्ति तैसि है नारी । राजपाटसवगनै उजारी ॥४॥
औरै पदको अर्थ स्पष्टै है ॥२।३। अब फिरि साहब के जनैयनकों कहैहैं
कि भिस्तिकहे स्वर्गको मानैहै तैसेनारीकहे दोजख को मानैहैं अरबीकी कि-
ताबनमें भिस्तिकों जिन्नत औ दोजखको नारी अर्थकै सम्बन्धते बहुत जगह
कह्योहै अथवा नारकहे आगि सोजामें होय ताको नारीकहैंहैं अर्थात् नरक और
भिस्ति पाठहोय तोजैसे भिस्तिकहे देवालको मानैहैं तैसे नारीको मानैहैं और
राजपाट जोहै जगत ताको उजारई गनैहैं कि संसार हई नहींहै चित अचितरूप
साहबईके हैं नरक स्वर्गादिक तामें प्रमाण ॥ “नरक स्वर्ग अपबर्ग समाना ।
जहँ तहँ देखि धरै धनु बाना” ॥ ४ ॥
जैसे नरकतसचंदनमाना । जसबाउर तसरहैसयाना ॥५॥
लपसीलौंगगनै यकसारा । खांडै परिहरिफांकैछारा ॥ ६ ॥
जैसे नरककहे बिष्ठाको तैसे चन्दनको मानैहैं औ हैंतौ सयान कहे साहब कों
जानैहैं परन्तु रहतबहुत बाउरही के तरहहैं ॥५॥ औ जे साहबको नहीं जानैहैं
आपहीको ब्रह्म मानैहैं तिनकोकहैंहैं लपसी लौंगको एकई मानैहैं खांड़ छोड़िकै
छारको फांकैहैं अर्थात् ताहूको एकही गनैहैं सर्वत्र एकही ब्रह्म मानैहैं जो
कहो समान दृष्टि करतईहैं साहबके गैर जनैयन कहे जाननवारे हैं ये आपहीकों
ब्रह्म मानैहैं औ खांड़ परिहरिकै छार फांकैहैं ताको भाव यहहै खांड़ साहबजें
मिठाई ताके देनेवारे तिनकों छांड़ि के छारफांकै हैं जामें सारकछुनहीं है
अहंब्रह्मास्मि ज्ञान करैहैं ॥ ६ ॥
साखी ॥ यहिबिचारते बहिगयो, गयीबुद्धिबलचित्त ॥
दुइमिलि एकै है रह्यो, मैं काहिबताऊं हित्त ॥ ७ ॥
श्रीकबीरजी कहैह बिचारतबुद्धिको बलजोहै निश्चयकरिकै अहंब्रह्म मानि
सो येहू जातरह्यो औ चित्तजोहै सोऊ जातरह्यो मनोनाश बासना क्षय ह्वैगई
कछु बासना न रहगई दुइ जेहैंब्रह्म औ जीव ते मिलिकै एकही है रहे जैसे