कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ तियसुन्दरी न सोहई, सनकादिक के साथ॥
कवहुंक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ९ ॥
ऐसा योग न देखाभाई । भूला फिरै लिये गफिलाई ॥१॥
महादेव को पंथ चलावै। ऐसो बड़ो महंत कहावै ॥ २ ॥
हाटबाट में लावै तारी। कच्चे सिद्धन माया प्यारी ॥ ३ ॥
कव दत्तै मावासी तोरी। कव शुकदेव तोपचीजोरी ॥ ४ ॥
श्रीकबीर जी कहैहैं कि ऐसा योग हम नहीं देख्यो है कि साहबको तो
जानै नहीं हैं गाफिल ह्वैकै भूले भूले फिरै हैं ॥ १ ॥ अरु महादेव को पंथजो
तामस शाखहै सो चलावै हैं औ बड़े महंत कहावै हैं ॥ २ ॥ सबके देखावन
को हाट में औ पहारन के बाट में तारी लगायकै बैठै हैं औ सिद्धकहावै
हैं औ सबके देखावन को यह कहैं हैं कि संन्यासीको धर्मनहीं है कि
द्रव्यलेय औ हाथछुवै परंतु जो कोई चढ़ाइक चलौ जाइहै ताको चिमटाते
लैकै कमंडलुमें डारिलेइ हैं सो ऐसे कच्चे सिद्धन को माया बहुत प्यारी
लगैहैं ॥ ३ ॥ दत्तात्रेय कबै मवासिनको शत्रुन को तौरचोहे औ शुकदेव कबै
तोपखाना अपने साथ जोरिकै चलायो है ॥ ४ ॥
कब नारद बंदूक चलाया । ब्यासदेवकवंबंबबजाया ॥५॥
करहिंलराई मतिकेमंदा । ईहैंअतिथिकितरकसबंदा ॥६॥
भये विरक्त लोभ मनठाना। सोनापहिरि लजावैबाना ॥७॥
घोराघोरी कीन्ह बटोरा । गाँवपायशचलो करोरा ॥८॥
औ नारद मुनि कबै बंदूक चलायो है औ ब्यासदेव कबै नगारादैकै काहूकें
ऊपर चढ़ेहैं ॥ ५ ॥ ई संन्यासी बैरागी मतिके मंद लड़ाई करै हैं ई
अतिथि हैंकि, तरकस बन्दसावंतहैं?॥६॥ भये तौ बिरक्त संन्यासी परंतु लोभ