कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ जेकरे शरलागै हिये, तब सो जानैगा पीर ॥
लागतौ भागै नहीं, सुखसिंधु निहारु कबीर॥६॥
तेहिवियोगतेभये अनाथा । परिनिकुंजवनपावनपाथा॥१॥
वेदौनकल कहै जोजानै । जो समुझैसोभलो न मानै ॥२॥
संपूर्ण जे जीव हैं ते परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनहीं के वियोगते अनाथ
ह्वैगये। निकुंज बन जो बाणीको जालहै नाना मत जिनमें परिकै एक सिद्धान्त
मत परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके मिलनके पाथ कहे पंथ न पावत भये ॥ १ ॥
जिनको पूर्व कहिआये कि साहब को नहीं जानै स्वांगभर बनावै हैं तिनको हे
जीवो! जो तैं जानै तौ वेदहू वे मतवारेन को नकलई कहै हैं तौ जो साहब को
समुझैहै सोऊ उनको नहीं मानै है नकलई मानै हैं ॥ २ ॥
नटवरवंद खेल जो जानै । ताकरगुण जो ठाकुरमानै॥३॥
उहैजो खेलैसवघटमाहीं । दूसरकोलेखा कछुनाहीं ॥४॥
भलोपोच जो अवसर आवै । कैसे कै जनपूरा पावै ॥५॥
अब योगिन को कहैहैं। नट कैसे बंटा जो कोई खेलै जानै है कहै यहजीव
आत्माको ब्रह्मांडमें चढ़ाइकैकै फिरिउतारै जानै है ताको गुण यहहै कि, समाधि
लगि जाइहै कहे ब्रह्मरूपह्वैजाइहै सो वही ब्रह्मको जो कोई ठाकुर मानैहै ॥ ३॥
अर्थात् जौनब्रह्ममें है ताउहौं तौने घटमें है दूसरेकी कछुनहीं लगै है अर्थात्
दुंसरो पदार्थ कछुनहीं है ॥ ४ ॥ सो जे यहमत करैहैं तिनको भलो पोचं-
कहे नीको नागा अवसर आवतहै अर्थात् जब जीवमें लीन है ब्रह्मरूप ह्वैजा-
इहै यातो भलो अवसर। औ जब समाधि उतरिगई जैसेकै तैसे ह्वैगई या पोच-
अवसरहै सो कैसे कै जन पूरो ज्ञान पावै कि हम पूर्णब्रह्महैं तो सर्वत्र पूर्ण
है जो या ब्रह्महै तातो तो समाधिउतरेहूमें वही वृत्ति बनी रहती ॥ ५ ॥
साखी ॥ जेकरे शरलागै हिये, तब सो जानैगा पीर ॥
लागतौ भागै नहीं, सुखसिंधु निहारु कबीर ॥६॥