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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 766 में से

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पृष्ठ 204

( १६४ ) बीजक कबीरदास ।
स्मृतिकहा आपनहिंमाना। तरिवरछलछागरह्वैजाना ॥ ९ ॥
जियदुरमतिडोलैसंसारा । तेहिनहिंसूझै वारनपारा ॥ १० ॥
हे जीवो ! तुम यह बिचारत जाउ कि निज कहे आपनो सार रामै नाम
को साहब मुख अर्थ समझिकै संसार ते छूटोगे अर्थात् साहब को स्वरूप औ
तुम्हारो स्वरूप राम नामही में है औ सब कहे ब्रह्मई है यह जो मानि राख्यो
है सो धोखा है झूठा है औ मायिक जो सकल संसार है सो झूठा है अथवा
सकल संसार में और जे मत हैं ते सब झूठे हैं ॥ ५ ॥ अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान करै है
सो सपने कैसी है अर्थात् झूठी है तैंतो किंचित् कहे अणुहै वा बिभु है झूठलों-
भंत कछु न विचारा तुम्हारे हिये में ब्रह्म नहीं समाय है कहे तुम्हारो ब्रह्म
होइबो नहीं संभवित होइ है याको छोड़िदेव औ वाको पार नहीं है कहैं
लवरी और न होय है याते झूठ लोभकिये है कि, मैं ब्रह्महोइ जाउँगो सो कछु
न विचारा काहेते अच्छा विचारनहीं किये है अथवा कछु न विचारा कहै
वा विचार कछु नहीं है मिथ्या है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ जौन स्मृति बतावैहै ॥ (स्याज्जीव-
नेच्छाद्यदितेस्वसत्तायांस्पृहायदि । आत्मदास्यंहरेःस्वाम्यंस्वभावंचसदास्मर॥१॥)
सो तुम स्मृतिको कहा आप कहे आपनो स्वस्वरूप न मान्यो धोखाब्रह्ममें लगिकै
अपने को ब्रह्ममानिकै तरिवर जोहै संसार ताको छल जो है धोखा ब्रह्मसोइ है
छागकहे बकरा ताही ह्वैकै कहे वह ब्रह्मह्वैकै तुमजान्यो कि हम चरिलेइँ
अर्थात संसारते छूटिजाइँ सो एतो बड़ो संसार रूपी वृक्ष कहा धोखाब्रह्म
बकरा चरोचरिजाइ है ॥ ९ ॥ जौन जीमें दुर्मति करिकै संसारमें डोलौहौ कहे
फिरौहौ सो अहं ब्रह्म माने संसारको वारापार न पावोगे वहतो धोखा है॥ १०॥
साखी ॥ अंधभयासबडोलई, कोइनकरैविचार ॥
हरिकिभक्तिजानेविना, भवबूडिमुआसंसार॥ ११॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि मैं येतोसमुझाऊं हौं परंतु सबसंसार की आंखि फूटि-
गई हैं अंधभया सबडोलैहै कहे फिरैहै यह विचार कोई नहीं करै है भक्तनको
संसार दुःखहरै सो हरि जेहैं सबकेरक्षक परमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनकी अनु-
रागात्मिका भक्ति बिना जाने भव जोहै धोखाब्रह्म तौनैहै भ्रमको समुद्र
ताहीमें संसार बूडिमुआ कहे संसारी जीव बूडिमुये ॥ ११ ॥
इति पैंसठवीं रमैनी समाप्त ।