कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १५१ )
परै जब न सूझि पर्यो तब अज्ञान द्वैगये नेतिनेति कहनलगे कि, अकथ है
कबीरजीका प्रमाण ॥ "वेदविचारि भेद जो जानै। सतगुरु मर्मशब्द पहिचानै"
॥ ४ ॥ गुरुवा लोग कहैं कि, वही जोहै अविनाशी सो सबके घटघट में
सबको नाच नचावै है औनटके वेष आपो नाचै है । सो कबीरजी शेखतकीसों
कहैं हैं कि, हे शेखतकी ! जो सबको नाचनचावैगो आपनटके वेष नाचैगो सो
अविनाशीकैसेहोइगो काहेते कि नटएक वेषलैआयोपुनि वह वेष छोड़िके और
वेष लैआयो याही भांति नानावेष नट धारणकरै हैं ते सब अनित्यहैं नाना वेष
धरिबो तौ मायाके गुणहैं वह मायाके परे कैसे होइगो औ जब मायाते परै
न होइगो तौ अविनाशी कैसे होइगो सो हे शेखतकी तुम सुनो वाहूबिचार करत
करत जो शेष रहिजायहै सो तुमहौ बातो तुम्हारहो अनुभवहै अथवा तुम शेषहौ
सो कार निराकार के परे जो साहब है ताको तुम शेष हौ कहै अंशहौ ॥ ५ ॥
इति तिरसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौंसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
काया कंचन यतन कराया।बहुत भांतिकै मन पलटाया॥१॥
जो सौवार कहौ समुझाई । तहिबो धराछोड़ि नहिंजाई ॥२॥
जनकेकहे जो जन रहिजाई।नवो निधि सिद्धी तिनपाई॥३॥
सदाधर्म तेहि हृदयाबसई । राम कसौटी कसते रहई ॥४॥
जोरि कसावै अंतै जाई । तौ बाउर आपुहि बौराई ॥ ५ ॥
साखी ॥ ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो शोच ॥
जहां संत तहँ संत सिधावै,मिलि रहे पोचै पोच ॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि ईजीवनके कायाको हम बहुत यतनकरवाया औ बहुत भांति
ते मन पलटाया कि तू धोखा कों त्यागि कंचन आपने स्वरूपको जानै॥ १ ?