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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

( १६६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ तिहत्तरवीं रमैनी ।
गुरुमुखचौपाई ।
चलीजातिदेखोयकनारी । तरगागरिऊपरपनिहारी ॥ १ ॥
चलीजातिवहबाटैवाटा । सोवनहारकेऊपरखाटा ॥ २ ॥
जाड़नमरैसुपेदीसौरी। खसमनचीन्हैघरणिभैबौरी ॥ ३ ॥
सांझसकारदियालैलैवारै। खसमछोड़िसुमिरैलगवारै ॥ ४ ॥
वाहिके सङ्गमें निशिदिनराँची। पिय सों वात कहैनहिँसाँची
सोवत छाड़िचली पिय अपना। ईदुखअवधौंकहौंकैहिसना
साखी ॥ अपनीजाँघ उघारिकै, अपनी कही न जाय ॥
की जानै चित आपना, की मेरोजन गाय ॥७३॥
चलीजातिदेखीयकनारी । तरगागरिऊपरपनिहारी ॥ १ ॥
चलीजात वहबाटैबाटा । सोवनहार के ऊपर खाटा ॥ २ ॥
सुरतिरूपी जोनारी सोईहै दूतीताकोहम चलीजातदेखाहैहृदयजोगगरी है सो
तरैहै औसुरति उठीसाऊपर सुधासरोवर में जल भरनको गई शीशमें पहुंची १॥
वह सुरति जबचलैहै तब षटचक्र बेधिकै राहराह जायहै काहेतेकि नाभीमें
मणिपुरक चक्रहै तामें शीशादिये नागिनी बैठीहै सोई षटकहे पलँगहै सो ऊपरहै
ताके नीचे सोवनहार जो है आत्मा सोरहैहै तहांते सुरतिउठैहै तहां ज्वाला साथ
नागिनी उठावै ताही साथ प्राणजायहै ॥ २ ॥
जाड़नमरैसुपेदी सौरी । खसमनचीन्हैघरणिभैबौरी ॥३॥
सांझसकार दियालैलैवारै । खसमछोड़िसुमिरै लगवारै॥४॥
सुपेदी कहें रजाई जोहै यह शरीर सो जाड़नमरै है अर्थात् शीत उष्ण
वहीको लगैहै सौरीकहै सुपेदीको सुमिरणकारैकैजाड़नमरैहै अर्थात् जबलग देहा-