कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६६ ) बीजक कबीरदास ।
स्थूल शरीर मंदिर उजार होइजाई है सो बिना परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके भजन जे
मरे जीवतौ मरिकै चौरासीलाख योनिमें भटकनेलगे औबाचे बाचनहार कहे जे
पांचौ शरीर ते बचिकै पार्षद रूप बाचन द्वार रहे ते बाचे ॥ ५ ॥
इति छयासठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सतसठवीं रमैनी ।
गुरुमुख चौपाई ।
देहहलाये भक्ति न होई । स्वांगधरेबहुते नर जोई ॥ १ ॥
धिंगाधिंगी भलो न माना।जोकाहू मोहिं हृदय न जाना २॥
मुखकछु औरहृदयकछु आना।सपन्यो कवहूं मोहिं नजाना ३
ते दुखपावैं यहि संसारा । जो चेतौ तौ होंहु निनारा ॥ ४ ॥
जो नर गुरुकी निन्दा करई । शूकर श्वानजन्मसो धरई ५
साखी॥लखचौरासीयोनिजीव, भटकि भटकि दुखपाव ॥
कह कबीर जो रामहिं जानै,जो मोहिं नीके भाव६
देहहलाये भक्ति न होई । स्वाँगधरे बहुतै नर जोई ॥ १ ॥
धिंगाधिंगीभलो न माना।जोकाहूमोहिंहृदय न जाना॥२॥
देह हलाये कहे पेट हलाय कुंडलिनी उठावै है औ स्वांगधरे कहे कोई खाख
लगावै है कोई जटा नहीं बढ़ावै है कोई टोपीदै अलफी पहिरि कुबरी लेइ है
कोईकोई तिलकैनहीं देय है कोई बेंडा तिलक देइ है कोई नाकते तिलक देइ
है कोई काठफल पाषाण अस्थि इत्यादि माला पहिरै है ऐसे स्वाँगधर नरनको
देखैहै सौबिना साहबके जाने भक्तिहोई है ? नहीं होइ है ॥१॥ धिंगाधिंगीकहे
बड़ेबड़े मालपुवा मोहनभोग खाय मोटायकै बडेबड़े धिंगा ह्वै रहे हैं औ बड़ी
बड़ी धिंगी ह्वैरही हैं भलो जो साँच मत ताको नहीं माने हैं साहब कहै
हैं जो कोई मोको हृदयते नहीं जानै है सो मोको पाव है ? नहा पावै है॥२॥