कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १६५ )
जल मिलिकै एकै है जायहै । हितुवा वहकहावै है। जो रक्षा करै ये तो दोनों एकई
द्वै रहे ब्रह्म में लीनहोइ पुनि जब सृष्टिसमय भई तब माया धरि लै आवै है तब
तो दूसरो यह मानतै नहीं है मैं काको हितुवां बताऊं जो मायाते रक्षा करिलेइ
औ जोसाहब हितुवामानै रक्षकमानै तौ साहब याको हंसस्वरूप देकै आपने पास
बोलाइलेइ इहांमायाकीगति नहींहै ता पुनिधरिके जीवको संसारी कैसे करै?॥७॥
इति इकहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
नारि एक संसारै आई । माय न वाके बाप न जाई ॥ १ ॥
गोड़ न मूड़ न प्राणअधारा । तामें भरमि रहा संसारा ॥२॥
दिना सातलों वाकी सही । बुधअधबुधअचरजयककहही॥३॥
वाहिकिबन्दनकरसबकोई।बुधअधबुधअचरजबड़ होई ॥४॥
एक नारि जो यह मायौहै सो संसार में आवतभई न वाके मंहतारी है आ न
वह बापते उत्पन्नहै अर्थात् अनादिहै ॥ १ ॥ अरु न वाके गोड़हैं न मूड़ है न
प्राणहै न आधार है अर्थात् निराकारहै भर्मैहै ताहीमें संसार भरमिरह्यो है॥२॥
औ सातो जे बारहैं दिन तिनमें वही मायाकी सहीहै अर्थात् कालमें वही अमि-
सैहै औ सातोंबार वोई फिरि फिरि आवैहैं वही मायाको चारोंओर बिस्तारहै
बुधजौहै पण्डित निर्गुणवारे जे सारासारके बिचारकारिकै आपहीको ब्रह्ममानैहैं
औ अधबुधेजैहैं आधेपण्डित सगुण उपासनावारे सो ये दोनोंमें आश्चर्य जोहै
माया ताको एक कहैहैं दोनोंमें यह माया बरोबरि व्याप्तहै ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी
कहैहैं कि यह बड़ो आश्चर्य्य है तौ कछुनहीं है औ वही मायाकी बन्दना निर्गुण-
सगुणवारे दोऊकरैहैं जो मन बचनमें आवैहै सोमायाहीहै ॥ ४ ॥
इति बहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।