कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजबजीव भूल्यो है तहिया कहे तब स्थूल शरीर नहीं रह्यो औ गुप्तकहे
सूक्ष्म कारण महाकारण येशरीर नहीं रहेहैं औ न तेहिजीवके सोगरह्यो औ
न मायारहीहै ॥१॥ जैसेकमल पत्रमेंजल रहैहै पै कमलपत्र म लिप्त नहीं रहै
है तैसेयह आत्मामें माया ब्रह्म यद्यपि सब कारण रहै हैं । परन्तु माया ब्रह्ममें
आत्मालिप्त न रह्यो ॥ २ ॥ ब्रह्मह्वैबेकी जो आशाहै ताईपियासह्रै सो ओसचाटे
कहूं पियास जाइहै ओसके समजौहै ब्रह्मानंद सो जीवरूपजैहैं अंड तिनमें
रहैहै अर्थात् कारणरूपते जीवमें बनो रहैहै जब समष्टिजीवरह्योहै तब रहैतौ
अगणितहैं अंड परंतु सब मिलि एकई कहावत रह्योहै अगणित कोई नहीं कहत
रह्यो ॥ ३ ॥ निराधार जो निराकार ब्रह्महै जामें सबजीव भेरैहैं ताको आधा-
रलै जानिये कि साहबके लोक में है अर्थात् साहेबके लोकको प्रकाशहै तबतो
समष्टिरही याही रामनाम लैकैबाणी उचरीकहे प्रकटभई इहां रामनाम लैकै
बाणीप्रगटभई ताकोहेतु यहहै कि बाणीमें जगत प्रगटकरिबेकी शक्ति नहीं रही
रामनामको जगत् मुख अथ लैकैबाणी उचरीहै पांचोब्रह्म समत जगत् उत्पत्ति-
कियोहै सोई इहां सिद्धांत करै है ॥ ४ ॥
धर्मकहै सब पानी अहई । जातीके मन वानी रहई ॥५॥
ढोरपतंगसरै घरिआरा । तेहिपानीसबकरै अचारा ॥ ६ ॥
फन्दछोड़िजो बाहरहोई । बहुरिपन्थ नहिं जोहैसोई ॥ ७ ॥
वेदशास्त्रमें आत्माको धर्म कहै हैं कि आत्माचितहै याते चित धर्महै जैसे
जलमें जलमिलै तो एकई होजाइहै ऐसेचिन्मात्र जो ब्रह्महै तामें मिलिकै चित्त-
जोहै जीव सोएकई ह्वैजाय काहेते कि दुहुनको चितधर्म एकईहै औ जातीकहे
सब जाति जेजीवहैं ते आपने स्वस्वरूपको चीन्हें हैं कि मैं साहबको अंशहौं जाति
कारिकै वहींहौं कछु स्वरूप करके नहींहौं भेद बनोई है बह सर्बज्ञहै मैं अल्पज्ञहौं
वह बिभुहै मैं अणुहौं वहस्वतंत्र है मैं परतंत्र हौं यह जो कहैहैं कि आत्मा
ब्रह्मई है सोतौ बाणीको बिस्तारहै सामान्यधर्मलैकै कहैंहैं ॥ ५ ॥ ढोर पतंग
घरिआर आदिक जामें सरै हैं ताही जलमें सब आचार करै हैं अर्थात् जौनी-