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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 766 में से

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पृष्ठ 213

ते अधवटजेहैं और और मतवारे इनकेसमुझाये नहीं समुझैं हैं। औ असंत संगकरिकै
विचारकी हानिहोइहै। कहाहानिहोइहै? कि औरऊको विचारमन पर न लागै है अपने
मतमें भ्रमहोन लगैहै आपनो ठीकनहीं वह ठीकहै जैसे आधी गगरी जलसे भरीहोइ
तो वाकोजल डोलैहै ऐसे साहबमें उनको ज्ञानतो पूरो नहीं ताते डोलैहै औ जो
पूरा सो बीचैलैकै बोलैहै और प्रश्न सुनिकै वाकोविचार लैलियो कहे समझि
लियो कि यह बोलिबो अधिकारी है हमारो कह्यो समुझैगो तब बोलैहै जैसे
भरी गगरी को जल नहीं डोलै है और जल वामें नहीं समाय है ऐसे वे तों
साहबके ज्ञान म पूर हैं सो उनको ज्ञान डोलै नहीं है अरु और मतनको सिद्धांतके
जे ज्ञान हैं ते उनके अंतःकरणमें नहीं समायहैं ॥ ५ ॥
इतिसत्तरवींरमैनी समाप्त ।
अथ इकहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
सोग वधावासम करिमाना । ताकी बातइन्द्रनहिंजाना ॥ १॥
जटातोरि पहिरावै सेली। योग युक्तिकै गर्भ दुहेली ॥ २ ॥
आसनउड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चील्ह मड़राई ॥ ३ ॥
जैसी भिस्त तैसि है नारी । राजपाट सब गनै उजारी ॥ ४॥
जैसे नरक तसचंदन माना। जसबाउर तसरहैसयाना ॥ ५॥
लपसी लौंग गनै यकसारा । खांड़ै परिहरि फांकै छारा ॥ ६॥
साखी ॥ यह विचार ते बहि गयो, गयो बुद्धि बल चित्त ॥
दुइ मिलि एकै है रह्यो, काहि बताऊ हित्त ॥ ७ ॥
सोगबधावा समकरिमाना । ताकीबात इंद्रनहिंजाना ॥ १॥
जटातोरि पहिरावै सेली । योगयुक्तिकै गर्भ दुहेली ॥ २ ॥