कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १५७ )
मुखकछु औरहृदयकछु आना।सपन्योकबहूंमोहिंनजाना॥ ३
तें दुखपावहिं यहिसंसार । जोचेतौतौहोहुनिनारा ॥ ४ ॥
जोनरगुरुकीनिन्दाकरई । शूकरइवानजन्मसोधरई ॥ ५ ॥
मुखमें तो और है कि, हम संन्यासी हैं हमसाधु हैं हमब्रह्मचारी हैं औ
हृदय में और है धनमिलैको उपाय खोजै हैं तेनर सपन्यो कबहूं मोकोनहीं
जानिसकैं हैं ॥ ३ ॥ सोऐसे जे प्राणी हैं ते यहिसंसार में दुःख नानाप्रकारके
पावै हैं सो हेजीवो ! तुम चेतकरौ तो इनसे न्यारा हैजाउ ॥ ४ ॥ औ जे
तात्पर्य्य वृत्तिकारिकै मोको बतावैं हैं ऐसे जे गुरु हैं तिनकी जोकोई निन्दाकरै
हैं कि, जोई वर्णन करै हैं सो सब मिथ्या है ते मरिकै श्वान अरु शूकरको
जन्म धारण करै हैं ॥ ५ ॥
साखी॥ लखचौरासीयौनिजीव, भटकिभटकिदुखपावै ॥
कहकबीरजोगमहिं जानै, सोमोहिंनीकेभावै ॥ ६ ॥
साहब कहैं हैं कि मेरोभक्त कबीर कहैहै कि चौरासी लाख योनिमें जीव
यह भटकि भटकि दुःख पावैहै सो तिनमें जोकोई श्रीरामचन्द्रको जानै सोई
मोको भावै है। ऐसो प्रकट कबीरबतावै हैं ताहूको और औरमें अर्थकरि और
और लगै हैं सो मोको नहीं जानै हैं ॥ ६ ॥
इति सतसठसवीं रमैनी समाप्त।
अथ अड़सठवीं रमैनी ।
चौपाई।
तेहिवियोगते भये अनाथा।परिनिकुंजन पावनपाथा ॥ १॥
वेदौ नकलकहै जे जानै । जो समझै सो भलो न मानै॥२॥
जटवर वन्द खेल जो जानै।ताकर गुण जो ठाकुर मानै॥३॥
उहैजो खेलै सबघटमाहीं। दूसर को लेखा कछु नाहीं॥४॥
भलो पोच जो अवसर आवै । कैसहुकै जन पूरा पावै॥५॥